ऐसा क्यों हो रहा है कि डॉ होमी भाभा जैसे ज्यादातर भारतीय परमाणु वैज्ञानिक ‘अप्राकृतिक मौत’ मर रहे हैं?

Posted on by Rubi
 
  

24 जनवरी को लगभग पचास वर्ष हो चुके होंगे जब मॉन्ट ब्लैंक के पास एक हवाई दुर्घटना में डॉ0 होमी भाभा की मृत्यु हुई थी। यह हादसा ठीक उस समय के बाद हुआ जब ‘भारतीय नाभकीय कार्यक्रम के पिता’ ने यह घोषणा किया कि यह देश अपने प्रथम नाभकीय यंत्र का उत्पादन करेगा। लगभग आधी सदी बीत जाने के बाद भी यह सुगबुगाहट चारों तरफ अभी बनी हुई कि कैसे अमेरिका की सीआईए के द्वारा वास्तविकता में हत्या हो रही थी जो भारत की नाभकीय महत्वाकांक्षा को रोकना चाहती थी।

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डॉ0 होमी भाभा की मृत्यु एक हवाई दुर्घटना ठीक थोड़ी देर बाद हुई जब उन्होंने घोषणा किया कि भारत अपने प्रथम नाभकीय यंत्र का उत्पादन करेगा।

आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है; और पहले की तरह रहस्यमयी मौतों का सिलसिला चल रहा है। पिछली जनवरी में, एक जनहित याचिका (पीआईएल), सक्रिय कार्यकर्ता चेतन कोठारी द्वारा डाली गयी थी जो बॉम्बे हाईकोर्ट में ऐसी मौतों की छानबीन करने के लिये एक विशेष जांच टीम बनाने के लिये की गयी थी। निश्चित रूप से, यह सिर्फ एक संयोग मात्र नहीं है कि ज्यादातर लोग जो प्रमुख नाभकीय संस्थानों के साथ जुड़े है और एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम करते हुये उनकी मौत हो जाय। ज्यादा चौकाने वाली बात यह है कि सरकार की तरफ से इस मामले में अनिच्छा भी दिखायी दे रही है।

अक्टूबर 2013 में, दो इंजीनियरों, जो भारत की स्वदेशी नाभकीय-शक्ति से चालित सबमरीन, अरिहंत पर काम कर रहे थे, का जीवन रहित शरीर विशाखापट्टनम नौपत्तन के पास रेलवे की पटरियों पर पाया गया। केके जोश और अभीश शिवम को जहर दिया गया था और उनके शरीर को ट्रैक पर छोड़ा गया था जिससे कि यह एक दुर्घटना जैसी लगे, लेकिन मृत शरीर को एक राहगीर द्वारा पता लगा लिया गया था इससे पहले कि ट्रेन उन्हें पीस कर गूदा बना देती। उन लोगों की रहस्यमयी मौत भारतीय सरकार को जगाने में असफल रही, एक बार फिर, रक्षा मंत्री इस मामले को सामान्य दुर्घटना बता रहे हैं।

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भाभा परमाणु शोध संस्थान से जुड़े वैज्ञानिक अप्राकृतिक मृत्यु से मर रहे हैं।

बहुत तेजी से नाभकीय शक्ति में भारत के विकास के साथ, भाभा परमाणु शोध केंद्र (बीएआरसी) से जुड़े वैज्ञानिकों की, नाभकीय शक्ति सम्पन्नों के द्वारा रची गयी, ऐसी रहस्यात्मक मौतों से मृत्यु होने का खतरा बढ़ गया है।

लोकनाथ महालिंगम, एक नाभिकीय वैज्ञानिक जो कैगा परमाणु शक्ति केंद्र, कर्नाटक में कार्य करते थे, 2009 में एक सुबह टहलने के लिये निकले थे और अदृश्य हो गये। वह देश की बहुत अधिक संवेदनशील नाभिकीय सूचनाओं को अपने पास रखते थे। जनहित याचिका कहती है, “जब नाभिकीय भौतिक वैज्ञानिक लोकनाथ महालिंगम का शरीर 2009 की जून में मिला, तब उसे आत्महत्या की तरह बताया गया और भारतीय मीडिया द्वारा बहुत अंदेखा किया गया” । क्या भारत ने उन्हें पता लगाने के लिये कोई गम्भीर प्रयास किया था? क्या यह सम्भव है कि दबाव डालकर सूचनाओं को परिवर्तित कर दिया गया था?

फरवरी 2010 को, एम अय्यर, बीएआरसी के एक इंजीनियर को उनके आवास पर मृत्यु के लिये दबाव डाला गया था। जांच करने वाली पुलिस ने इस मामले को आत्महत्या के रूप में घोषित करके पर्दा डालने की कोशिश किया। विधि चिकित्साधिकारियों के अनुसार, वैज्ञानिको और इंजीनियरों की इन सभी रहस्यमय मौतों के पीछे नाभिकीय कार्यक्रम में शामिल होना है, इन सभी मामलों में किसी के भी उंगलियों के निशान, और ऐसे ही कई अन्य सुराग, जो पुलिस को हत्यारों को पहचानने या हत्यारों के देश का पता लगाने में मदद कर सकते थे, नहीं मिले। आत्महत्या स्वकथनों को लेकर मृतकों के परिवारों द्वारा चुनौती दिया गया था, उनका कहना है कि कथन में इन लोगों ने किसी भी तरह का पश्चाताप या अवसाद (डिप्रेशन) का संकेत नहीं दिया, जो स्पष्ट करता है कि उन्हें ऐसा कदम उठाने के लिये मजबूर किया गया था।

हम अब भी यह नहीं चिल्ला सकते हैं कि बुद्धिजीवियों का पलायन हो रहा है, बल्कि हम उन लोगों को सुरक्षा देने में असफल हैं जो भारत में रहना और उसकी सेवा करना चाहते हैं। होमी भाभा की रहस्यात्मक मौत का मामला फिर से खोला जाना चाहिये। शायद, उनकी मृत्यु की वर्षगांठ शुरुआत की तारीख बन सके। भारत को उनका बहुत आभारी होना चाहिये।

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