हिंदी डोमेन जल्द ही बहुत तेजी से वास्तविकता में फैल सकता है अगर ‘डिजिटल इंडिया क्लब अपना रास्ता बनाती है!

Posted on by Samiksha Pathak
 
  

स्पष्ट रूप से, इक्कीसवीं सदी अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की है! आज महत्वाकांक्षा-प्रेरित भारतीय अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजना चाहते हैं। अभिभावक यह चाहते हैं कि उनके बच्चें अपने सम्बंधियों से अंग्रेजी में बात करें… यह एक अच्छा प्रभाव छोड़ता है।

यह बहुत विकृत, दूषित समझ है जो भारत को सबसे अच्छे से प्रतियोगिता करने से दूर रखता है। यह एक विकृत मस्तिष्क है जो यह समझता है कि सफलता केवल अंग्रेजी में दक्षता या इसकी कमी पर निर्भर है। चीन को देखिये।

यह दुख:द मानसिकता है जो किसी को भी आश्चर्यचकित करती है- क्या वास्तविकता में भारत की अपनी राष्ट्रीय भाषा है? वास्तविकता में नहीं। हिंदी केवल हमारी कार्यकारी भाषा होने के कारण जिंदा है, जिसे भारत के संविधान ने सुरक्षित रखा है। लेकिन यह वर्तमान परिदृश्य में हमारे पवित्र संविधान को धोखा दे रही है।

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भारत के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों ने अंग्रेजी भाषा को स्वीकार किया है चाहे वह उच्च शिक्षा क्षेत्र, मीडिया, न्यायिक, अधिकारी-वर्ग या व्यावसायिक घराने ही क्यों न हों। एक अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति महानगरीय संस्कृति की पहचान होता है। वह एक हत्यारा, बुरे कर्मों में विश्वास करने वाला हो सकता है, लेकिन अगर वह अंग्रेजी बोलता है, तो वह ज़िंदगी से बड़ा माना जाता है। लेकिन वे केवल भारत की कुल जनसंख्या के 6-7% का ही प्रतिनिधित्व करते हैं, बाकी लोग केवल हिंदी वाले हैं, या बेहतर कहें तो हिंगलिश बोलने वाले हैं।

अंग्रेजी में अच्छा होने के क्रम में, हम अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी जीवन शैली को भूल चुके हैं। हम हिंदी को कमजोर बना चुके हैं।

क्या आप एक ऐसे देश में जीवित रह सकते हैं जहां, बहुमत में होने के बावजूद भी, आपको साधारण चीजों- लेबल, सूची, सड़क किनारे के संकेत पढ़ना, इंटरनेट को चलाना, कर भरना, कार्यालयी दस्तावेज, पाठ्यक्रम किताबों आदि के लिये प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है। भारतीयों का एक अत्यधिक तीव्र दल आधारिक सूचनाओं को समझने में संघर्ष करते हैं क्योंकि वे सभी अंग्रेजी में होते हैं। आजकल कोई भी अपने संकेत हिंदी में नहीं देता है। विश्वविद्यालय और सरकारी नौकरियां, अंग्रेजी में धारा प्रवाह चाहती हैं, जैसा कि अंग्रेजी बोलने वाले अभिजात वर्ग के शासकों ने अनिवार्य किया है। इसे और भी सारांश रूप से कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसके अंग्रेजी भाषा में अच्छा या खराब पर निर्भर करता है, यह लगभग एक शोचनीय मानक है!

लगभग सभी दिशाओं में केंद्रीय भूमिका में ‘डिजिटाइज़ेशन’ के साथ, लोगों की ज़िंदगी इंटरनेट के चारों ओर बहुत तेजी से घूमेंगी, इससे ज्यादा सुविधाजनक और समय की बचत होगी। परिणामस्वरूप, ई-कॉमर्स ऑनलाइन कम्पनियों का झुंड उभर चुका है। हालांकि, क्योंकि उनमें से बहुत सारी कम्पनियां अंग्रेजी भाषा में संवाद और व्यवसाय करती हैं, हिंदी भाषी बहुलता, इन सबको समझे बिना पीछे छूट जाती है कि इन सबका का क्या मतलब है, उनमें शामिल हुये बिना अकेला छोड़ देते हैं।

यद्यपि, विचारधारायें बदल रही हैं, क्योंकि भारत की पारम्परिक संस्कृति के कुछ लोगों द्वारा शुरूआत हुई है। बहुत सारी ई-कॉमर्स कम्पनियां भाषायी अवरोधों को हटाने के लिये अपने एप्लिकेशन, वेबसाईट और पोर्टल को हिंदी में करने की तरफ उन्मुख हैं जिससे कि दूरदराज इलाकों में अंग्रेजी भाषा से अछूते लोगों तक अपनी सूचनायें पहुचा सकें।

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Digitalindia.club, हिंदी को ऊठाने और मजबूत बनाने के प्रयासों में, हिंदी डोमेन के उच्च विचार के साथ आया है। डिजिटल इंडिया क्लब वेबसाइट डोमेन, ईमेल आईडी और वेब समपर्कों को हिंदी में बनाने में शामिल है। हिंदी डोमेन में से एक www. हरहरमहादेव.com है। सामाजिक संचार माध्यम पटल जैसे ट्विटर और फेसबुक, इससे अच्छा जवाब और झुकाव प्राप्त कर रहे हैं। ट्विटर का दस्ता है #हिंदीमेहैदम। हिंदी को पुनर्जीवित करने के प्रयासों में से एक भोले की फौज है।

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वास्तविकता में, नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया आंदोलन  में उनका सहयोग स्वीकृत किया जा चुका है, कम्पनी को विश्वास दिलाते हुये ज्यादा गहरे उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ा रहा है।