विशेषाधिकार चुराना: स्टेडियम खिलाडियों की कार्यक्षेत्र है, जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम का नाम बदलो

Posted on by Samiksha Pathak
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सरकार के लिये यह नीति बनाना मह्त्वपूर्ण है कि खेल राजनैतिक प्रभाव से अपमानित न हो। ये अंचाहे हस्तक्षेप विभिन्न रूपों में आते हैं। प्रसिद्ध प्राप्त राजनैतिकों के नाम पर स्टेडियम एक इसी तरह की दखलंदाजी है!

क्यों नहीं सम्पूर्ण देश के खेल स्टेडियमों के नाम खिलाड़ियों के नाम पर नहीं रखे जाते हैं। स्टेडियम और खेल के मैदान खिलाड़ियों के कार्यक्षेत्र हैं, न कि राजनैतिक लाभ के शोषण का मैदान होते है। कोची विकास प्राधिकरण, जवाहरलाल नेहरू अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम में एक स्टैंड का नाम केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण के नाम पर रखने की योजना बना रही है। शायद, यह राज्य के गैर-खिलाड़ियों द्वारा स्टेडियम को चुराना का ताज़ा मामला होगा।

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विशाखापट्टनम में क्रिकेट स्टेडियम का नाम बजाय अजहरूद्दीन और वीवीएस लक्ष्मण जैसे महान खिलाड़ियों के, एक उपद्रवी मुख्यमंत्री,वाइएसआर के नाम पर रखा गया।

ध्यान चंद स्टेडियम में हॉकी खेलते समय, या स्टैंड से देखते समय, एक अजीब सी धड़कन होती है, एक ऐसा अनुभव जो ज्यादा जोश भर देता है। वहाँ उस नाम की महानता जुड़ जाती है, और यह खिलाड़ियों को उत्साहित करता है कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ दें, जिसकी प्रशंसा उस समय हिटलर ने की थी।

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दूसरी तरफ, स्टेडियम जैसे चिन्नास्वामी स्टेडियम (पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष) बेंगलुरू में, चिदम्बरम स्टेडियम (पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष) चेन्नई में, ईडन गार्डन कोलकाता में, फिरोज शाह कोटला स्टेडियम दिल्ली में, और स्वामी मान सिंह स्टेडियम (जयपुर के महाराज), सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम पर जिनका खेल में शून्य योगदान है।

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चिढ़ का अंदाजा लगाइये, जब कोई इन नामों के बारे में सोचता है जैसे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम और इंदिरा गांधी स्टेडियम।

कुछ स्टेडियमों, जैसे वानखेडे स्टेडियम मुम्बई में, पूर्व क्रिकेटरों-सचिन तेंदूलकर, सुनील गावस्कर, विजय मर्चेंट, वीनू  माकंड, पॉली उमरीगर और विजय मांजरेकर के नाम पर स्टैंड है। लेकिन क्यों केवल क्रिकेटरों के लिये ऐसा है? गैर-क्रिकेट खिलाड़ियों का भी नाम स्टेडियम में होना चाहिये। हमारे प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ियों जैसे बाइचुंग भूटिया के नाम पर भी स्टेडियम में स्टैंड होना चाहिये जो देश में अन्य खेलों को भी प्रोत्साहित करेगा जहाँ सम्पूर्ण देश में क्रिकेट फैला हुआ है।

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इटली के दो बड़े क्लब, एसी मिलान और इंटर मिलान, एक स्टेडियम को साझा करते है जिसे कि सन सिरो के एक ही नाम से उल्लेख किया जाता है।

केवल स्टेडियम ही नहीं, यहाँ तक कि रोड, भवन, पुरस्कार आदि सभी राजनीतिज्ञों के नाम से जोड़े जाते हैं। लगातार सुर्खियों में रहने की लालसा में खेल संस्कृति को तोड़ा गया है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को स्टेडियमों के राजनैतिक नामों को खिलाडियों और खेल के लोगों की शख्सियत के साथ अवश्य बदलना चाहिये। केवल उन्हें अपने नाम के मूल्य से विशेष अधिकार प्राप्त है न  कि दरवाजा तोड़ के अंदर घुसने वाले राजनीतिज्ञों के नाम को प्राप्त है।

 

 

 

 

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