क्या पवित्र कुरान धर्म के नाम पर हत्या को प्रोत्साहन देता है?

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

यह दिल दहला देने वाला विचार है, मैं जानता हूं, लेकिन क्या मुझे अंदेखा करना चाहिये क्योंकि मेरे मुसलमान भाई इसमें ईशा निंदा के विचार को पायेंगे? मुझे इसे आपके साथ साझा और अपने आपको कह कर जी हल्का करना चाहिये।

मैं एक धार्मिक मुसलमान लड़की हूं और मैं कुरान को अपने हाथ में बड़े फक्र के साथ पकड़ती हूं। समय और फिर एक बार, पवित्र शब्द ने अशान्ति के समय में मलहम की तरह कार्य किया है, मुझे निर्देशित किया और मुझे रास्ता दिखाया है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने दिन रात अपनी निगेहबानी में मुझे रखा है।

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हम धर्मपरायण मुसलमान परिवार है और हम इस्लाम के सिद्धांतों को अपनी क्षमता के साथ पालन करते हैं। हाल ही में, मेरा सामना पवित्र किताब के कुछ पहलुओं पर केंद्रित हुआ, कुरान, जिसने मेरी नींव को हिला डाला। मैं कुछ दिनों के लिये संतप्त थी, अपने अल्लाह से प्रश्न पूछती और उससे अपने आपको को बताने और अपने शब्दों के छिपे हुये अर्थों को अपने बच्चों को बताने के लिये पूछती रही। मेरे लिये, वे अनिष्ट की आशंका को ध्वनित करते हैं।

कुरान(2:216)- “लड़ना आपके लिये निर्धारित किया गया है, और आप लोग इसे नापसंद करते हैं। लेकिन यह सम्भव है कि आप लोग जिस चीज़ को नापसंद करें वह आपके लिये अच्छा हो, और आप लोग जिस चीज़ को पसंद करें वह आपके लिये बुरा हो। लेकिन अल्लाह जानता है और आप लोग नहीं जानते हैं” ।

यह कथन स्पष्ट कहता है कि हिंसा हमेशा गलत चीज़ नहीं होती है। यह भी स्पष्ट करता है कि लड़ने की चाहत हमेशा आत्म-रक्षा नहीं होती है, सुननेवाला निश्चित रूप से उस समय हमला नहीं चाहता था। हदिथ ((पैगम्बर मोहम्मद के शब्द और कथन) से, हम जानते है कि यह कथन उस समय कहा गया था जब पैगम्बर मोहम्मद अपने अनुयायियों को खाद्य और अन्य उपयोगी वस्तुओं को व्यावसायिक गाड़ियों से लूटने के लिये उत्साहित करना चाहते थे।

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कुरान(3:56)- “जो लोग विश्वास करने से मना करते हैं, मैं उन्हें इस और इसके बाद की दुनिया में भयावह दंड दूंगा, उनकी सहायता करने वाला भी कोई नहीं होगा” ।

कुरान(4:74)- “जो लोग अल्लाह के रास्ते पर चलते हुये लड़ते हैं और इस दुनिया के जीवन को दूसरों के लिये निछावर कर देते हैं। जो अल्लाह के रास्ते पर लड़ते हुए चाहे वह मर जाय या वह जीत जाय मैं उसे बहुत बड़ा उपहार प्रदान करूंगा” ।

यह आजकल के आत्मघाती बमदस्तों के लिये अध्यात्मसम्बंधी वाक्य के रूप में स्वीकार किया जाता है।

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इस मंगलवार को, लीबिया में आईएसआईएस नियंत्रित क्षेत्र में चार भारतीयों में से एक को रोक लिया गया था, उसे आईएसआईएस द्वारा छोड़ जाने से पहले यह तथ्य उद्घाटित किया गया था कि वह ‘इस्लाम का अनुयायी’ बने। उसने कहा कि आतंकवादी इसे डर के साथ फुसफुसा रहे थे! यह विषय समझ से परे है। इस्लाम में “हिंसा के उपयोग” और “अन्य धर्मों के साथ अस्तित्व में रहना” के मुद्दे को निकाल पाना बहुत कठिन है।

11 सितम्बर की भयावह घटना के बाद, बहुत सारे मुसलमानों ने सौगन्ध लिया कि इस्लाम हिंसा को नहीं सिखाता है, और जो लोग इसके लिये जिम्मेदार है वे सच्चे मुसलमान नहीं हैं!अन्यों ने यह कहते हुए अपने को अलग किया कि हिंसा इस्लाम का हिस्सा है और जरूरत पड़ने पर इसका अवश्य प्रयोग किया जाना चाहिये।

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ऐसे बहुत से कथन है जो बहुत साफ कहते है कि इस्लाम के लिये अरूचि रखने वाले के प्रति भी कुरान शांति पूर्ण आचरण की शिक्षा देता है। दूसरी तरफ, ऐसे अन्य कथन भी हैं जो अनियंत्रित हिंसा को प्रतिध्वनित करता है: “लेकिन जब निषिद्ध महीने बीते जाये, तब आप लोग उन्हें जहाँ कहीं उन्हें पायें मूर्तिपूजकों से लड़े और मार डालें, उनका अवरोध करें, उन्हें तंग करें और हर छल कपट (युद्ध) के लिये उनके इंतज़ार में रहें; लेकिन अगर वे पश्चाताप करते हैं और नियमित उपासना करते है और नियमित दान देते हैं,तो उनके लिये रास्ता खोल दें: अल्लाह उन्हें माफ कर देगा, वह बहुत दयालु है”-(9:5)

किस कथन को मुसलमानों को अपनाना चाहिये? इस्लाम, अपने पवित्र पुस्तक में, आत्मरक्षा और उन लोगों, जिनके साथ मुसलमानों का समझौता नहीं था, के विरूद्ध युद्ध की अनुमति देता है।

मोहम्मद कि महबूबा पत्नी, आयशा, ने कहा: “उनका चरित्र कुरान था” ((मुसलमान कहा) । हमने बहुत से गुप्ताघात के उदाहरण देखे हैं जिनमें पैगम्बर मोहम्मद सीधे तौर पर शामिल रह चुके हैं। इन सब उदाहरणों में से ज्यादातर में, पीड़ित व्यक्ति ने मोहम्मद के विरूद्ध शायद ही कुछ कहा हो।

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मोहम्मद ने एक बार अल-हरिथ बी सुवैद नामक आदमी को मार दिया था। जब अबु अफाक ने एक कविता लिखी, इस हत्या पर विरोध जताते हुये, तब मोहम्मद ने कहा, “इस दुष्ट आदमी के साथ मेरे लिये कौन सलूक करेगा?” मोहम्मद के एक अनुयायी ने लम्बे डग भरते हुये आगे बढ़कर उसके पास गया और उसे मार डाला। (इब्न हिशाम-दर एल जील बेइरुत- 1411- भाग 6- अबु फलक की मौत के लिये उमइर की खोजयात्रा) ।

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तब क्या आतंकवादी सही हैं? नहीं। मासूम लोगों की हत्या करने का उनको कोई अधिकार नहीं था। पवित्र पुस्तक आतंकियों को यादृच्छिक तरीके से किसी की भी हत्या करने का अधिकार नहीं देता है। लेकिन तब क्या, किसी भी कारण से हत्या करना गलत है। किसी की ज़िंदगी छीनने का भगवान का विचार कैसे हो सकता है?

हम मुसलमान ऐसे तकलीफदेह ईश्वरोक्ति के साथ कैसे शांति करा सकते हैं? हम कैसे विश्वास करें कि इस्लाम एक शांति-प्रिय धर्म है?

मैं विश्वास करना चाहती हूं, लेकिन जब तक कोई मुझे इस्लामिक संदेशों की प्रामाणिक व्याख्या बताता और समझाता नहीं है, मैं डरी हुई हूं। मैं आसानी से ज्ञात होने वाले संदेहों को हटा नहीं सकती हूं।

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