क्या स्वच्छता धार्मिकता है? तो हरिद्वार कैसे पवित्र हो सकता है? यह शहर किसी भी प्रकार की गंदगी को नहीं रख सकता है!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

मैंने हाल ही में हरिद्वार की यात्रा कि और पवित्र शहर पर ध्यान देने में कमी के प्रति गुस्से और आक्रोश के साथ वापस लौट आया। हरिद्वार लूट का खेल बन चुका है। पुजारी और संत, हरिद्वार और उसकी पवित्र आस्था के नाम पर, श्रद्धालुओं, भगवान से डरने वाले लोगों का शोषण कर रहे हैं।

हरिद्वार ‘परमसत्ता’ से मिलने का द्वार नहीं रह गया है। मेरी यात्रा पर, मैंने, कुछ बताये हुये दृश्य को देखा जिसने मेरी राय को बदल दिया। मेरा मानना है कि यह शहर ‘छुपे हुये अपराधियों’ का है जहाँ इसकी धार्मिकता का लाभ हरिद्वार के मालिकों द्वारा लिया जा रहा है।

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आइये मैं आपको अपनी आंखों से आज के हरिद्वार को दिखाता हूं…..

आप शहर में घुसते ही गन्दगी से पीड़ित हो जायेंगे। रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड, सड़क और सड़क के किनारे सभी प्रकार के कूड़े से भरे पड़े रहते हैं। खबरों के अनुसार, मानव हड्डियां सड़क के किनारे पायी जा चुकी है। लोग जो शहर में रहते हैं वो बतायेंगे कि उन्हें दुर्गंध सहने की आदत हो चुकी है। बाहरी होने के रूप में, मैंने चोट को सहा। एक जगह पर सांस लेने में दिक्कत हुयी और मेरे मित्र ने मुझे संभालने में मदद कि।

गंगा नदी के किनारे बहुत ही गंदे और घिनौने है। नदी के किनारों के चारों ओर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है जहाँ आप बैठकर नदी और डूबते हुये सूरज को देख सकते हों। सारी जगह खोमचेवालों और पंडितों के अधिकार में है जिन्होंने किनारे पर यादृच्छिक तरीके से स्थायी जगह बना लिया, तीर्थयात्रियों को अपनी निजी पूजा के लिये कोई जगह नहीं छोड़ता है। हर जगह पर भिखारी फैले हैं जो भगवान के नाम पर खाना और धन मांगते रहते हैं। हरिद्वार कैसे पवित्र शहर कहला सकता है जब यहाँ के लोग मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भीख मांगते है? अपने खजानों को भरने के बजाय, पंडित और तथाकथित संत अपने मंदिर के कोषों को गरीबों के लिये क्यों नहीं खोल देते हैं?

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लोग अपने कपड़ों को नदी में धुल और खंगाल कर इसे और अधिक गंदा कर रहे हैं। अखिलेश यादव द्वारा चलायी जा रही उत्तर प्रदेश सरकार ने अशुद्धता और अपवित्रता पर चर्चा शुरू कर दिया है और हरिद्वार को पकड़ लेना चाहते हैं। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ केवल नरेंद्र मोदी का सपना नहीं है; यह हम सभी लोगों का होना चाहिये।

आरती के समय ‘हर की पौड़ी में’, एक पंडित आया और मुझे धार्मिक कार्यों को करने के लिये सफलतापूर्वक प्रभावित किया। एक बार जब मैंने 5 मिनट का धार्मिक कार्य कर लिया, तो बनावटी गम्भीर चेहरे से, 500 रूपये शुल्क/दान के रूप में मांगा। मुझे शहर में धोखे का एहसास हुआ जहाँ लोगों को अन्य जगहों की तुलना में ज्यादा सतर्क रहने की आवश्यकता होती है।

वहाँ अच्छे से तैयार महिलायें थी, जो हमें किसी धार्मिक कृत्य के लिये दूध दे रहीं थीं, जो गंगा को और अधिक दूषित कर रहा था। वे भी अपने दूध और समय के लिये पैसा मांग रहीं थी। वह स्थान पर्यटक स्थल में बदल चुका है, पर्यटकों को चारों ओर पैसे के लिये गलत तरीके से मूर्ख बनाया जाता है। किसी के पास अंतरात्मा नहीं है।

हरिद्वार का बहुत अधिक व्यावसायीकरण हो चुका है। यह बहुत हृदयविदारक तथ्य है। इसके पास पहले आत्मा थी जो अब मर चुकी है। धर्म का अब व्यावसायीकरण हो चुका है।

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मैंने किसी भी होटल में पहले से बुकिंग नहीं कराया था क्योंकि यह सप्ताहांत पर अचानक से यह योजना बनीं थी और टिकट के लिये पागलों की तरह भागना मेरा पागलपन था। मैं जानता था की आरक्षण को पाना बहुत मुश्किल होगा। सभी होटलों, चाहे सस्ते होटल हों या महंगे होटल, ने भरे होने का बोर्ड लगा रखा है। सच्चाई इससे कुछ अलग है। कुछ कमरे भगवान और धर्म के नाम पर अवैध उद्देश्यों के लिये भरे हुये थे। छुपे स्थानों पर काला बाज़ारी हो रही थी। वातावरण ज्यादा धार्मिक नहीं है और वे आपको सही तरीके से ध्यान नहीं देते है भले ही आपने पाये जाने वाली सुविधाओं के लिये अपना धन दिया हो।

सुबह के समय भी, नदी के किनारे के छोटे मंदिर पंडितों से भर जाते हैं जो हर छोटे तिलक, जिसे वे आपके माथे पर लगाते हैं, के लिये दान और धन के लिये मांग करते हैं और यदि आप नहीं देते हैं तो आपको अपमानित करने के लिये आपको गाली भी देते हैं।

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यह सामान्य अवधारणा है कि इस शहर में किसी भी जगह पर मांसाहारी भोजन या शराब नहीं मिलता होगा, लेकिन ऐसी बहुत सारी जगहें है जो इसे उपलब्ध कराते हैं। जरा सड़क से हट कर जायें और आप सभी जगह पा जायेंगे। यहाँ तक कि, आप शहर में चरस और हशीश के नशेड़ियों को भी देखेंगे। शहर में नशे की आदत के प्रकार को देखकर मैं चकरा गया। मुझे हर जगह घास की गंध आ रही थी जहाँ कहीं भी मैं गया।

सबसे दुखदायी दृश्य यह है कि हर इंच पर शहर में भिखारी है जिन्होंने धन कमाने के लिये भीख मांगने को सबसे आसान रास्ता बना लिया है। मैंने बहुत स्पष्ट रूप से महसूस किया, जब मैंने एक साधू को देखा जो मेरे सामने भीख मांग रहा था, 5 मिनट बाद मोटरसाइकिल चला रहा था। इन दुष्ट के लिये भीख मांगना धन कमाने का एक तरीका है जो शरीर और दिमाग़ से सुदृढ़ होने के बजाय निर्लज्जता के साथ धन मांगते हैं।

एक अनुभव के बाद मैंने आशा व्यक्त की और प्रार्थना किया कि भोजन मुझे सांत्वना देगा। ऐसा नहीं होना था और मैंने अपने आप को हरिद्वार आने के लिये बुरा भला कहा। मैंने भोजनस्थलों को देखने के बाद अपनी भूख को खो दिया। बिना किसी स्वच्छता और स्वास्थ्य देखभाल के बदबूदार और गंदा था। लोग सोचते हैं कि हरिद्वार उनकी रक्षा करेगा।

मैंने, चोटीवाला, मोहनजी पूरी वाले और बृजवासी के यहाँ खाया, लेकिन उनमें से कोई भी न्यूनतम स्वच्छता को बनाये नहीं रखता। हमें खाना था इसलिये खा लिया।

मेरी सोची समझी सलाह उन लोगों के लिये है जो हरिद्वार के प्रति ऊंची आशायें रखते है, आप उन सभी खतरों से सावधान रहें जिन्हें आप हरिद्वार में सामना करेंगे। यह एक खतरनाक जगह बन चुकी है।………………..

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