भारतीय संविधान की अदृश्य महिला निर्मातायें

Posted on by Srishti Jain
 
  

कल्पना करें, ऐसा कैसे हो सकता है कि हमारा संविधान एक छोटी सी पुस्तक के रूप में बना, जिसे हम जहाँ चाहें आसानी से ले जा सकते हैं। लेकिन यह वास्तविकता थी, हम उस पुस्तक की ओर तुरंत ही दौड़ पड़ते हैं, अगर हमें किसी पुलिस स्टेशन पर अवैध रूप से रोक लिया जाता था। या हो सकता है कि किसी प्रकार से अनादर होने पर हम संविधान के अनुच्छेद को तेजी से बताने लगते हैं, जब कानूनी अधिकारी हमें सामान्य से कारणों के लिये डराने धमकाने की कोशिश करते हैं, अगर हम उन्हें पर्याप्त मात्रा में घूस नहीं देते हैं।

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एनी मस्करेने (बायें) और दुर्गाबाई देशमुख

यद्यपि यह विचार बहुत अवास्तविक लगता है, लेकिन हम इस बात से मना नहीं कर सकते हैं कि यह पुस्तक हमारे अधिकारों के बारे में बहुत जल्दी न केवल बतलाती है बल्कि इन अधिकारों को प्रयोग करने में सुगमता भी देती है। यह वही था, जिसे संविधान की रूपरेखा रखे जाने के समय पर सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ता अम्मू स्वामीनाथन ने बतलाया था। उन 15 में से एक महिला जिसने संविधान को बनाने में सहायता की थी, अम्मू ने भारतीय महिलाओं को समान अधिकार देने के लिये जोर दिया। और आशा व्यक्त किया कि यह दस्तावेज़ राज्य के प्रति उनके अधिकारों और उत्तरदायित्वों को लोगों को एहसास दिलाने में सहायता करेगा।

1950 में, भारतीय संविधान अस्तित्व में आया। इस दस्तावेज़ के बनाये जाने के छियासठ वर्ष बाद भी, भारत वर्षों पुरानी लैंगिक युद्ध के साथ अब तक चिपका हुआ है। संसद में महिलाओं के लिये आरक्षण चर्चा का एक गर्म मुद्दा है, और ऐसे ही कई अन्य लिंग सम्बंधी सामाजिक मुद्दे है जिनको भी सुलझाये जाने की सख्त आवश्यकता है।

बेगम अज़ीज़ रसूल

बेगम अज़ीज़ रसूल का चित्र सीलोन संसदीय प्रतिनिधि मंडल के साथ

यद्यपि, 1950 की इन पंद्रह महिलाओं को कल्पना से परे आज़ादी दी गयी थी, उस समय पर जब महिलाओं की भूमिका केवल उनकी रसोइयों तक सीमित थी। जब भारतीय महिलायें बच्चों को बड़ा कर रही थीं और अपने परिवार को खुश रखने की कोशिश कर रही थीं, ये महिलायें अपनी ओजस्वी आवाज़ से लहरों को पैदा करके संसद में अपने साथी पुरूष सांसदों का विचलित कर रही थीं।

वे उन मुद्दों को उठा रहीं थीं जो उस समय पर सही थे: देवदासियों का व्यवहार में होना, एक ऐसी परम्परा जहाँ महिलाओं को भगवान के प्रति समर्पित कर दिया जाता था और खुलेआम पुजारियों के द्वारा वेश्यावृत्ति में उपयोग किया जाता था; अवैधानिक रूप से पुलिस द्वारा रोका जाना, बाल विवाह। ये महिलायें, जो पढ़ी लिखी थी, इस बात को भलीभांति जानती थीं कि एक महिला के लिये अपने अधिकारों के बारे में जानना और शिक्षित होना कितना आवश्यक है। वे बाल विवाह के विरुद्ध और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिये बोल रहीं थीं। यह पर्याप्त नहीं था कि सम्पन्न और शक्तिशाली लोगों के लिये निश्चित अधिकारों को हटाया जाय…..वे यह चाहती थीं कि सभी भारतीयों को सभी अधिकार मिलने चाहिये।

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हंसा मेहता अपने पति के साथ, लगभग 9 नवम्बर 1931 में

संसद को कुछ सांकेतिक राहत भी देनी चाहिये थी। इनमें से कुछ सदस्यों को राज्य सभा में निर्धारित समय से अधिक देर तक, अपने पुरूष साथियों की तुलना में, अपना भाषण देने के लिये अनुमति दी गयी थी, क्योंकि ये महिलायें थीं!

यद्यपि इतिहास नें सरोजिनी नायडू और विजयालक्ष्मी पंडित के नामों से हमें परिचित कराया, फिर भी उन 13 नामों के योगदान को समय बीतने के साथ भुला दिया गया।

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विजयालक्ष्मी पंडित अपने भाई जवाहरलाल नेहरू के साथ

बेगम अज़ीज रसूल ने पर्दा प्रथा को हटाने की आवश्यकता और समान नागरिक संहिता के बारे में बोला था, और हंसा मेहता, एक वकील और एक राजनीतिज्ञ, ने महिलाओं के आधिकारों के लिये वकालत की थी। भारतीय महिलाओं के लिये उनके अधिकारों के घोषणा पत्र के भाग को, जिसे 1927 में बनाया गया था, सन्युक्त राष्ट्र के मानव अधिकारों में बाद में स्वीकार किया गया था। वे सन्युक्त राष्ट्र के मानव अधिकार परिषद में गयीं और भारत को विश्व के नक्शे पर स्थान दिलाया।

पूर्णिमा बैनर्जी अवैध कारावास के विरूद्ध लड़ीं और दक्ष्याणी वेलायुधन दलित अधिकारों के लिए लड़ीं। एन्नी मस्करेने ने इस बात को प्रमुखता दी कि केंद्रीयकरण आवश्यक था। दुर्गाबाई देशमुख ने प्रादेशिक उच्चन्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायालयों की स्वतंत्रता की आवश्यकता, राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया, और नये राज्यों में नये उच्च न्यायालयो की स्थापना के लिये सलाह दी। पूर्णिमा बैनर्जी ने एक अनुच्छेद पर भी काम किया था जो इस बात को सुनिश्चित करता था कि राज्य-सहायता प्राप्त विद्यालयों में जाति और धर्म के नाम पर अंतर नहीं करेगा। रेणुका रे ने शिक्षा के लिये समुचित बजट की व्यवस्था को लक्ष्य किया।

sarojini naidu and mahatma gandhi

महात्मा गांधी और सरोजिनी नायडू

यह सभी महिलायें, वर्तमान भारत के तकरार करते सांसदों के समूह की तुलना में, अपने विचारों में बहुत विकसित थीं। संविधान सभा में बहस के दौरान, उन्होंने महिलाओं से आरक्षण को दूर रखने की आवश्यकता पर बहस किया था। सभी संदर्भों में समानता को सुनिश्चित कराना उनके युवा भारत का सपना था।

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