तीस लाख नागरिकों की मौत बंगाल के अकाल में हुई थी, क्योंकि चर्चिल ने “अमानुषिक भारतीयों” को सहायता देने से मना कर दिया था

Posted on by Rohan Desai
 
  

1942-43 का बंगाल अकाल ब्रिटिश भारत की एक भुला दी गयी कहानी है। ब्रिटिश राज के अन्य अत्याचारों पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के कार्यों से हमारी स्कूली पुस्तकें भरीं पड़ी है, लेकिन इस दुख:द त्रासदी को, जिसने तीस लाख लोगों को मारा, कई इतिहास की पुस्तकों में उचित स्थान नहीं मिल पाया है। हो सकता है, यह कुछ ऐसा करना रहा हो जो सामान्य नागरिकों या खेतिहर किसानों के लिये रहा हो, जिनका स्वतंत्रता संघर्ष में कोई योगदान न रहा हो।

इंग्लैंड, द्वितीय विश्व युद्ध के नायक विंसटन चर्चिल का बहुत सम्मान करता हो। जिन्होंने यूरोप को नाज़ियों से बचाया था, इस देश ने उस समय चुप्पी साध लिया था जब उसे अकाल के बारे में बताया गया था। चर्चिल का नाज़ियों के लिये विरोध मात्र एक देशभक्ति का दिखावा था। वास्तविकता तो यह है कि वह अपनी उपनिवेशीय पूर्वाग्रह और जातीय भाव को छुपाना चाहता था।

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1942-43 का बंगाल अकाल ब्रिटिश भारत की एक भूलाई गयी कहानी है

बंगाल का अकाल से सफाया ठीक उसी समय हुआ जब यूरोप में जर्मनों ने जाति संहार को प्रयुक्त किया था। जबकि चर्चिल ने हिटलर की उत्कृष्ट जाति के सिद्धांत की गिरफ्त से ब्रिटेन को मुक्त कराने के लिये एक नये सिद्धांत को बनाया था, इसलिये उसने भारतीयों की ओर से अपना मुंह मोड़ लिया, जो जिंदा ठठरियों में बदल रहे थे।

यह बादशाही सिद्धांत था जिसे चर्चिल की देखरेख में बनाया गया था, जो बंगाल में तीस लाख लोगों की मौत का कारण बना, यह आज के पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार और बांग्लादेश को शामिल करता है। यह सत्य है कि 1942 की फसल चक्रवात के कारण नष्ट हो गयी थी। लेकिन यह प्रधानमंत्री की हेकड़ी थी जिसने कई लोगों को मौत की ओर ढ़केला था। भारत ने जनवरी से जुलाई 1943 के बीच 70000 टन चावल का निर्यात किया था, जबकि यहाँ अकाल था। यह मात्रा चार लाख लोगों के लिये एक साल तक के लिये पर्याप्त थी।

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यह चर्चिल द्वारा बनाया गया बादशाही सिद्धांत था जो बंगाल में 30 लाख लोगों की मौत का कारण बना।

इसके अतिरिक्त, 1942 में शुरू किये गये भारत छोड़ो आंदोलन ने, चर्चिल को बहुत परेशान किया था, और इसका बदला लेने के लिये उन्होंने बंगाल की इस आपदा को अंदेखा करना चुना। इसके बजाय उन्होंने चावल और गेहूं को शाही भारतीय सेना को भेजा जो ब्रिटिश साम्राज्य की तरफ से द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ रही थी।

इस बीच अकाल से पीड़ित लोग कलकत्ता में आना शुरू हुये, समाज के सम्पन्न वर्ग से उबले चावल से बचे माड़ के पानी को मगने लगे। चर्चिल ने यूं ही अंतर्राष्ट्रीय खाद्य और चिकित्सा को यूरोप में अच्छी आपूर्ति वाले सैनिकों को पहुंचा दिया, जिसकी आवश्यकता सबसे अधिक भूखे लोगों को थी।

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भारतीय सैनिक बर्मा में। द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा जीत गया, इससे इंग्लैंड भयभीत हो गया कि अगला निशाना भारत न बन जाय।

जब बर्मा (आज के म्यान्मार) हारा गया, तब इंगलैंड भयभीत हो गया कि भारत अगला लक्ष्य हो सकता है। चर्चिल ने जानबूझकर नकारात्मक सिद्धांत को अपनाते हुये बंगाल में खाद्य भंडार को कम रखा था। इसके पीछे का तर्क बहुत आसान था, अगर जापानी सेनायें पहुंचती हैं, तो वे खाद्य की कमी के द्वारा परेशान हो जायेंगी। आक्रमण के भय से, पानी के रास्ते वाली नावों को नष्ट करके अनावश्यक बना दिया गया था। इसलिये बंगाल के लोगों, जो समुद्री व्यवसाय पर आधारित थे, के पास कोई अन्य साधन नहीं था, यहाँ तक कि भूख से बचने का कोई सम्भव उपाय भी नहीं था।

जब सिकुड़ी हुई चमड़ी के साथ कलकत्ता की गलियों में लोग अपनी आखिरी सांस ले रहे थे, उस समय चर्चिल उपहास और मजाक कर रहा था। उसने निर्लज्जता के साथ कहा “अकाल हो या अकाल न हो, भारतीय नस्ल खरगोश की तरह बढ़ेगी” । वह इस बात से खुश था कि प्रकृति प्रसन्नतापूर्वक भारतीय जनसंख्या को कम कर रही थी।

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विंसटन चर्चिल इस बात से खुश था कि अकाल प्रसन्नता के साथ भारतीय जनसंख्या को कम कर रही थी

हजारों भूखे लोगों के दो चिल्लाहट पर उन्होंने ध्यान दिया, जो लोग खाने लायक घास को खा रहे थे और भूख से बचने के लिये वाइन को ले रहे थे। चर्चिल ने बड़ी निर्लज्जता के साथ अपनी घृणा को व्यक्त किया, “मैं भारतीयों से घृणा करता हूं वे एक अमानुषिक धर्म के साथ एक अमानुषिक लोग हैं” । उसका मुख्य आरोप यह था कि वे गोरी चमड़ी के नहीं थे।

चर्चिल के नेतृत्व वाली सरकार ने इस फैसले को पलट दिया, जिसे लियोपोल्ड एमरी (राज्य के भारतीय सचिव) और अर्चिबाल्ड वैवल (भारत के वायसराय) ने भूख के कारण हजारों लोगों के मरने की वजह से बंगाल से खाद्यों का निर्यात रोकने की आवश्यक विनती को किया था। चर्चिल ने कठोरता से प्रत्युत्तर किया कि, “तो अब तक गांधी क्यूं नहीं मरा?”

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जब ब्रिटिश अधिकारियों ने चर्चिल से अकाल राहत पहुचाने की विनती को इस संदर्भ में किया कि हजारों भारतीय मर रहे थे, तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने कहा कि “तब अब तक गांधी क्यूं नहीं मरा?”

महात्मा गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत किया था, और यह गति भी पकड़ रहा था। चर्चिल के लिये, जिसका विश्वास था कि भारतीयों को बादशाही मुकुट के अंतर्गत होने के लिये धन्यवाद देना चाहिये, यह उनके चेहरे पर जोरदार थप्पड़ था। यह विस्फोट बदले की एक सुरक्षित अभिव्यक्ति थी। जब ब्रिटिश अधिकारियों ने चर्चिल से इस खाद्य समस्या को हल करने की अपील किया, तो उन्होंने बंगाल को खाद्य पहुचाने के लिये ज़हाजों की कमी का रोना रोया। निश्चित रूप से उन्होंने अपने मुंह से झूठ बोला था; ज़हाज़े आस्ट्रेलिया से गेहूं को भारत की ओर से यूरोप को ले जा रहा था चूंकि आयात बहुत कम हो गया था। इसलिये महंगाई आसमान छू रही थी। जो लोग भुखमरी से पीड़ित थे, इस महंगाई को सहन नहीं कर सकते थे।

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यह अकाल 1943 में समाप्त हुआ, जब बचे हुये लोगों ने अपनी चावल की खेती को पैदा किया। लेखक मधुश्री मुकर्जी, जो मुट्ठीभर बंगाल के अकाल से बचे हुये लोगों से मिलीं, ने अपनी पुस्तक “चर्चिल्स सीक्रेट वार” में लिखा, “”अभिभावकों ने अपने भूखे बच्चों को नदी और कुयें में फेक दिया था बहुत सारे लोगों ने अपने आप को ट्रेनों के सामने फेंक अपनी जान ले ली……. लोग इतने कमजोर हो गये थे कि वे अपने नज़दीकियों का अंतिम संस्कार भी नहीं करते थे”।

यह था कि कैसे सम्पन्न बंगाल ब्रिटिश राज द्वारा कमजोर हुआ: एक घृणास्पद राज्य-वंचित लोगों को भटकते जानवरों की तरह गलियों में मरते हुये देखता रहा।

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