भारत कब अपनी गलतियों से सबक लेगा? पठानकोट पर हुये हमले को, पाकिस्तान के साथ दोस्ती के सपने के बाहर, हमें सोचना चाहिये

Posted on by Ridhi Sharma
 
  

हाल ही में हुआ पठानकोट आतंकी हमला हमें एक साफ संदेश देता है। इससे कोई मतलब नहीं कि भारत कितना प्रयास करता है, पाकिस्तान अपने गुमराह करने के तरीके को नहीं बदलेगा। यह वैसा ही रहेगा अगर, हर बार भारत शांति वार्ता की शुरुआत करने की कोशिश करेगा, तब वे बंदूकों और मोर्टार से जवाब देंगे। आखिरकार, पिछले दो दशकों से यही दिखायी दे रहा है। सबसे बड़ी बात यह है, हम अपने बहादुरों को खो रहे हैं, और हम अपने अतीत में हुई गलतियों से कुछ नहीं सीख रहे हैं।

Pathankot attack

हम, एक देश के रूप में बहुत भोलेभाले है, हम पाकिस्तान के शब्दों को उसका चेहरा मान लेते हैं। इसलिये हर बार भूलने की कोशिश करते हैं। भारत बहुत बडे विश्वासघात के घावों के साथ सजा पा चुका है। जो कुछ भी थोड़ी उम्मीद थी प्रधानमत्रीं नरेंद्र मोदी की, 2 जनवरी की, लाहौर यात्रा ने हमें दिया था, वह भारतीय जवानों और जैश-ए-मोहम्मद के संदेहित आतंकियों के बीच हुये भीषण युद्ध ने खत्म कर दिया।

कुछ ही हफ्तों पहले यह दुख:दायी घटना हुई, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पाकिस्तानी समकक्षी के जन्मदिन उत्सव को मनाने के लिये यात्रा किया था। इस अनियोजित अनौपचारिक मुलाकात ने दोनों देशों का ध्यान खींचा था। सबसे अधिक हिला देने वाली बात यह थी कि, यह हमला ठीक इस यात्रा के अंत पर ही हुआ।

Narendra modi and nawaz sharif

पठानकोट हमला पाकिस्तान प्रश्नों के द्वारा जबरदस्ती था। सेना अभी फेसबुक जासूसी में फंसे भारतीय वायु सेना के व्यक्ति रंजीत की पराजय की टीस झेल रहा था जब यह आतंकी हमला पठानकोट में हुआ। स्पष्ट है, सेना इस हमले के लिये नहीं तैयार थी। भारत हमले के भय और अविश्वास पर लकवे की तरह खड़ा है जो दो दिनों में खत्म हुई। वायु सेना अड्डे पर हुये इस हमले ने कई प्रश्नों को खड़ा कर दिया है। उस पर घाव पर नमक छिड़कने का काम तब हुआ, जब सेना का जल्दबाजी में किया गया यह दावा कि हमला खत्म हो गया है, जबकि हमला दो दिनों तक और चला। निश्चित रूप से, सुरक्षा बलों के बीच में योजना की कमी थी, जिसका परिणाम जवानों की ज़िंदगी खोने में हुआ।

एक शांति वार्ता के ठीक बाद पाकिस्तान का हमारे ऊपर हमला उनका एक तरीका भी है। 1999 के अतीत में, भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने द्विपक्षीय वार्ता के लिये पाकिस्तान की यात्रा की, और कुछ ही महीने बाद उन्हें कारगिल युद्ध उपहार स्वरूप मिला। 2008 में पाकिस्तान के साथ मनमोहन सिंह ने वार्ता किया था, तो मुम्बई में कायरता पूर्ण हमला हुआ था। इस नियोजित हमले में 160 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुये थे। और अब, सेना के वायु अड्डे पर यह दु:साहसी हमला हुआ।

Pathankot attack

आश्चर्यजनक यह है कि केंद्र की तरफ से कोई भी बात नहीं हो रही है। पाकिस्तान ने अपनी ओर से पहले ही मामले को देखने के लिये कह दिया है और आतंक को हटाने के लिये कड़े कदम ले रहा है। लेकिन क्या वे सभी के लिये कह रहे हैं, उन सभी वर्षों में जब कभी भी कोई आतंकी हमला अलग अलग लोगों और बिल्डिगों पर हुये है।

केंद्र में बैठे विपक्षीगण पठानकोट में मरने वाले लोगों के अंतिम संस्कार में किसी भी केंद्रीय मंत्री के न जाने पर तीखी आलोचना कर रहे हैं। राज्य के राजनैतिक सितारों  ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराया और बहादुर सिपाहियों का अभिवादन किया। लेकिन ऐसा लगता है कि यह विरोध को कम करना है। क्या यह समय नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री अपने वादे को निभायें और बात को आगें बढ़ायें? हम उनकी स्वीकार्यता को देखना चाहते हैं जो उनकी राजनैतिक रैलियों में प्रसिद्ध था।

पाकिस्तान के विरूद्ध अमेरिका की कार्यवाही के लिये इंतजार करना हमारे पक्ष में कार्य नहीं करेगा। भारत की दुर्दशा के बारे में दो चीत्कार की देखभाल की परवाह अमेरिका की तरफ से प्रतीत नहीं होता है। अमेरिका में कुछ कानून निर्माता पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता का पुनर्मूल्यांकन करना चाहते हैं और भारत पर हुये हमले के मुद्दे को उठा भी रहे हैं। अमेरिकी प्रधानमंत्री बराक ओबामा, जो अपने निज़ी देश में बंदूक नीति को रोकने की कोशिश पर तेजी दिखा रहे हैं, इस मुद्दे पर ध्यान दें, और पाकिस्तान के साथ हथियारों के व्यवसाय पर अपना रूख साफ करें।

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