नेताजी के सबसे नज़दीकी सहयोगी ने 80 किलो सोने का कोष लूट लिया था, प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू ने इस बात को अनदेखा किया था

Posted on by Debolina Hazarika
 
  

नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे युद्ध नेता आज तक कोई नहीं हुआ। उन्होंने पिछली शताब्दी में किसी भी भारतीय नेता द्वारा एकत्रित किये गये दानों की तुलना में युद्ध के लिये सबसे बड़े दान को एकत्रित किया था। जनवरी 29, 1945 को, रंगून (बर्मा) में रहने वाले भारतीय प्रवासियों ने अपने प्यारे नेताजी के जन्मदिन समारोह में अपने प्यार को प्रदर्शित करने के लिये सोने का दान दिया था।

उस समय जापान द्वारा अधिग्रहीत बर्मा की राजधानी, रंगून, में खुशामद करने के लिये 48वें जन्मदिन पर आज़ाद हिंद के मुखिया नेताजी के लिये एक सप्ताह लम्बा समारोह आयोजित किया गया था। और सप्ताह के अन्तिम दिन 2 करोड़ रुपये का दान एकत्रित किया गया था, जिसमें 80 किलोग्राम सोने के आभूषण भी शामिल थे।

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जब नेताजी ने उत्तेजित करने वाला भाषण दिया, तब विदेश में रहने वाले भारतीयों ने अपने आपको आभूषण विहीन किया था, और नेता के पैरों पर भारत की स्वतंत्रता के निमित्त आदर स्वरूप अपने बहुमूल्य सोने को चढ़ा दिया। लेकिन 18 अगस्त 1945 को नेताजी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु के साथ ही, कई किलो सोने से भरा बक्सा भी अदृश्य हो गया, कथित रुप से माना जाता है बोस के नज़दीकी सहयोगियों के द्वारा चुरा लिया गया था।

सालों से घोषित अतिगोपनीय दस्तावेजों को पिछली जनवरी में गुप्त सूची से हटाकर, दशकों पहले सोने के कोष में हुये गबन को दुहरा दिया गया है, जो उस समय के प्रधानमंत्री की जानकारी में पूरी तरह से था, जो विदेश मन्त्री के रूप में भी कार्यरत थे। 1951 और 1955 के बीच टोक्यो और दिल्ली के बीच होने वाली बातचीत यह प्रदर्शित करती है कि नेहरू सरकार इस गबन के बारे में पूरी तरह से जानती थी, लेकिन वह प्रदर्शित करती रही कि उसे कुछ भी नहीं मालूम था।

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नेताजी की मृत्यु एक हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को हुई

21 मई 1951 को, टोक्यो मिशन के प्रमुख केके चेत्तूर ने नेताजी के दो नज़दीकी सहयोगियों: :अधिप्रचार मंत्री एसए अय्यैर और टोक्यो में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (आईआईएल) के मुखिया मंगा राममूर्ति का नाम लेकर मुद्दे को उठा दिया था। चेत्तूर ने अक्टूबर के ठीक उसी साल में लिखा था जिसमें जापानी सरकार ने मिशन से कहा था कि बोस ने अपने साथ “अच्छी मात्रा में सोने के आभूषण और बहुमूल्य पत्थर रखा था, लेकिन उन्हें केवल दो बक्से के साथ दुर्भाग्यशाली फ्लाइट में जाने की अनुमति दी गयी थी” ।

चेत्तूर ने बताया कि “नेताजी का संग्रह उनके वजन से भी ज्यादा था”। पांच साल के बाद, एमईए के द्वारा बनाई गयी एक वर्गीकृत रिपोर्ट को आरडी साठे के द्वारा नेहरू को सौंपी गयी थी।

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सुभाष चंद्र बोस यूरोप में

रिपोर्ट बतलाती है कि कैसे राममूर्ति ने शांती के साथ अपने कद को बढ़ाया जबकि अन्य भारतीय नागरिक टोक्यो में जापान युद्ध में पीड़ित हो रहे थे। साठे ने संदेह व्यक्त किया था कि कोष को राममूर्ति के लिये, जो कर्नल फिग्स के नज़दीकी और ब्रिटिश मिशन के सैन्य का हिस्सा थे, ब्रिटिश सरकार के द्वारा बांटा जा चुका था। राममूर्ति को यूके में मामले का अंत करने के लिये कर्नल के द्वारा आमंत्रित भी किया गया था”।

इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि रिपोर्ट पर जवाहरलाल नेहरू के हस्ताक्षर भी थे, जिस पर विदेश सचिव ने यह लिखा था कि “प्रधानमंत्री इस रिपोर्ट को देख चुके हैं”।

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सभी रिपोर्टों को देखते हुए भी कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी थी जिसमें उस समय के अनुसार बहुत बड़ी धनराशि 2 करोड़ रूपये से अधिक का गबन हुआ था। दूसरी तरफ, राममूर्ति जापान में वैभवपूर्ण जीवन को लगातार जी रहे थे, जबकि अय्यैर ने उनके भारत वापस आने पर बहुत गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था। 1953 में, अय्यैर को नेहरू के पंचवर्षीय योजना के झंडे के नीचे प्रचार के लिये एक सलाहकार भी बनाया गया था।

उन सबने न केवल सोने को ले लिया, बल्कि नेहरू के द्वारा लाभ भी पहुचाया गया था जिनके मन में बोस के लिये सदैव एक कड़ुवाहट भी दिखायी पड़ती थी। यह दो चोरों का भाग्य था जिन्होंने नेताजी के युद्ध कोष को लूटा था जो वास्तविकता में ब्रिटिशों के विरूद्ध युद्ध लड़ने के लिये रखा गया था।

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