नेताजी की मृत्यु ताईपे(Taipei) के हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी। इस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने उत्तर प्रदेश में एक साधू के रूप में अज्ञात जीवन को व्यतीत किया

Posted on by Rashmi Jain
 
  

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु के चारों ओर फैला रहस्य किसी अचम्भे से कम नहीं है इसलिये अक्सर, उनके अज्ञात जीवन से सम्बंधित नये-नये सबूत उनकी मृत्यु की राख से उठ खड़े होते हैं जो इतिहास में 1945 में हवाई दुर्घटना में हो चुका है।

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कुटिल कार्बन कॉपी या अज्ञात जीवन? नेताजी (बायें) और गुमनामी बाबा (दायें) में अचम्भित करने वाली समानता थी

उत्साही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की मृत्यु के चारों ओर विवादित वादविवादों के बीच में, मौजूद एक साधू, जिसका नाम गुमनामी बाबा( कथित तौर पर साधू), की उपस्थिति दावा करती है कि नेताजी की मौत कभी भी हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी। इस सिद्धांत को सबसे अधिक महत्व तब मिला जब बाबा उत्तर प्रदेश में रहते थे।

हालांकि अब भी गुमनामी बाबा की वास्तविक पहचान के बारे में अनुमान लगाया जाता है, ऐसा कोई भी तथ्यात्मक सबूत इस दावे के सम्बंध में नहीं था कि बाबा कोई कार्बन कॉपी नहीं थे, बल्कि नेताजी स्वयं भेष बदल कर रहते थे। हाल ही में कुछ लोगों, जो गुमनामी से सम्बन्धित थे, ने बोस के रहस्यमय तरीके से गायब होने के बारे में सभी विश्वासों को एक बार फिर हिला दिया है।

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किताबों का एक संग्रह जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से सम्बंधित था, बाबा के बक्से में मिला था। इन किताबों में नेताजी थ्रू जर्मन लेंस(बायें), भारत: द क्रिटिकल इयर्स, इंडिया-चाइना वार, इंडिया विंस फ्रीडम, नेताजी एंड बंगबंधु। बाबा के पास एक समाचार पत्र का कटा अंश है जिसमें नेताजी और हिटलर साथ हैं (दायें)

इलाहाबद उच्चन्यायालय द्वारा दिये गये दिशा निर्देशों के आधार उत्तर प्रदेश के प्राधिकारियों ने म्यूज़ियम में दिखाने हेतु सूचीबद्ध करने के लिये गुमनामी बाबा के दो बक्सों को खोला है। इन बक्सों से अधिकारियों को जो प्राप्त हुआ उसे देखकर वे भौचक्के रह गये।

इन बक्सों में बाबा की निजी सामानों के बीच में बोस की परिवारिक फोटों भी शामिल हैं। शक्ती सिंह, राम भवन के मालिक, ने नेताजी के परिवार की फोटो को पहचान चुके हैं।

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सुधीर चंद्र बोस, सतीश चंद्र बोस, सरत चंद्र बोस, सुरेश चंद्र बोस, सुनील चंद्र बोस और सुभाष चंद्र बोस ऊपरी पंक्ति में। मध्य पंक्ति में, जानकीनाथ बोस और प्रभावती बोस अपनी तीनों पुत्रियों के साथ बैठी हुयी है। नीचे की पंक्ति में, जानकीनाथ बोस के नाती बैठे हुये हैं।

एक ख्याति प्राप्त व्यक्ति गुमनामी बाबा के रूप में उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्थानों: लखनऊ, फैजाबाद, सीतापुर, बस्ती और अयोध्या में टहलता रहा। गुमनामी बाबा ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष फैजाबाद के राम भवन में 1982 से 1985 के बीच बिताया। उनकी मृत्यु 16 दिसम्बर 1985 को हुयी।

ऊपरी तौर से, नेताजी की भतीजी ललिता बोस (सुरेश चंद्र बोस की पुत्री) ने राम भवन में गुमनामी बाबा से मिलने के लिये फरवरी 1986 में गयीं थीं।

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द्वितीय विश्व युद्ध के युद्धक हवाई जहाज़ का चित्र बक्से में मिला था( बाये); हाथ का बनाया चित्र जो गुमनामी बाबा के उत्तर प्रदेश में रहने के स्थानों को दिखाता है

अगर ये फोटोग्राफ अधिकारियों की परेशानी को बढ़ाने के लिये पर्याप्त नहीं थे, तो उसमें बहुत से टेलीग्राम है जो बाबा को इंडियन नेशनल आर्मी के शीर्ष अधिकारियों पबित्र मोहन रॉय और सुनील कांत गुप्ता के द्वारा भेजे गये थे।

1950 में, कई षड़यंत्र की कहानियां उठी थीं कि नेताजी जीवित थे। अन्य दूसरे तथ्यों ने भी महत्व तब प्राप्त करना शुरू किया जब एक फोटोग्राफ में उन्हें 1964 में जवाहरलाल नेहरू के अंतिम सन्सकार में सम्मिलित होते हुये देखा गया था।

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लेकिन गुमनामी बाबा की कहानियों ने ऐसे कई सारे तथ्यात्मक प्रमाणों को दे चुके हैं जिससे उनका सम्बंध श्रद्धेय राष्ट्रवादी नेता से दिखाता है। बाबा के पास एक सोने की डंडी वाला चश्मा था जो नेताजी के चश्मे के समान था, उनके पास जर्मनी का बना शक्तिशाली दूरबीन भी था, उनके पास स्वामी विवेकानद का एक फोटोग्राफ भी था, खोसला आयोग के सामने उपस्थित होने के लिये जारी किये गये सम्मन की मूलप्रतियां, अविभाजित भारत के मानचित्र का संग्रह था।

उनके सम्बंधित सामानों में से जो पहले प्राप्त की गयीं थीं, उनमें शामिल था, एक टॉर्च पेंसिल जिसका प्रयोग सामान्यतया सेना के जवानों द्वारा नक्शा बनाने में किया जाता है, नेताजी की मौत की जांच से सम्बंधित समाचार पत्रों की कतरन, और नेताजी के अनुयायियों के पत्र।

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नेताजी की लिखावट। दाहिने: गुमनामी बाबा की लिखावट। फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ0 बी लाल ने मुखर्जी आयोग को बताया कि दोनों लिखावटें मिलती जुलती है।

एक अन्य साजिश जो सामने आयी वह एक व्यक्ति का पत्र था जो ताइवान में खोसला आयोग के साथ था, जो कहता है: “हमें ताइहोकू (ताइपे) में केवल 15 दिन मिला था। फारमोसा (ताइवान) का काम पूरा हो गया है……….मैं सारी बातें इस पत्र में नहीं लिख सकता हूं, अगर आप अनुमति दें, मैं वहाँ एक सप्ताह के लिये आ सकता हूं।”

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केवल पिछले साल, नेताजी के नाती आशीश रे ने दावा किया कि उनके पास इस बात को प्रमाणित करने का “अकाट्य प्रमाण “ है कि बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में गम्भीर रूप से जलने के बाद 18 अगस्त 1945 को ताइवान, ताइपे में हुआ था। रे के दावा में दो डॉक्टरों, एक नर्स, एक जानने वाले और बोस के समर्थित सेना के कर्नल हबीबुर्रहमान शामिल है जिन्होंने उनके अंतिम क्षणों के साक्षी बने थे।

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1985 में गुमनामी बाबा के अंतिम संस्कार में उपस्थित श्रद्धालू

वर्तमान में पायी गयी जानकारियां नेताजी के परिवार के दावे को झुठलाते हैं। हो सकता है कि गुमनामी बाबा ही हमारे प्यारे नेताजी हों। हालांकि, नुक्ताचीनी संदेह बचा रह जाता है; क्यों निडर नेता इस प्रकार का अज्ञात जीवन जीता रहा जब भारत एक स्वतंत्र देश था और उनके जीवन को कोई संकट नहीं था?

यह रहस्य अभी जारी है……………

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