ममता बनर्जी द्वारा माल्दा दंगे के महत्व को कम बताना उपद्रवियों को गलत संदेश देता है। राज्य की मुखिया को उचित सावधानी के साथ कार्य करना चाहिए

Posted on by Rashmi Jain
 
  

भारत में हुई अब तक सभी हिंसाओं की तुलना में माल्दा हिंसा ने लोगों के मस्तिष्क में ज्यादा हलचल मचा दिया है। बंगाल के उत्तरी हिस्से में हुई इस घटना के कुछ दिनों बाद वहाँ पर अब तक किसी भी मुख्य धारा की मीडिया द्वारा समाचारों का प्रसारण नहीं किया गया है। यह केवल सोशल मीडिया है जो माल्दा, पश्चिम बंगाल में स्थिति साम्प्रदायिक संवेदनशील जिलों में से एक, के बारे में ताज़ा खबरों को पहुचाने का प्रयास कर रहा है।

 Malda riots

3 दिसम्बर को यह हिंसा, दक्षिण पंथी नेता के विवादित बयान के कारण, माल्दा में कलाईचक में शुरू हुआ। इस घटना क्रम में, एक मुस्लिम आंदोलनकारियों के झुंड ने पुलिस थाने और गाड़ियों में आग लगा दिया, विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार यह संख्या एक लाख से लेकर दस लाख तक हो सकती है। दक्षिण पंथी नेता ने पैगम्बर मोहम्मद के विरूद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी को किया था। जल्द ही यह साम्प्रदायिक आग पुर्निया, एक मुस्लिम बहुल बिहार के क्षेत्र, में भी फैल गया, वहाँ पर भी दंगा शुरु हो गया। एक गुस्सायी भीड़ ने बीएसएफ की गाड़ी में आग लगा दिया और बैसी पुलिस थाने पर हमला करके उसे लूट भी लिया।

Paresh Rawal comment on Malda riots

इधर, ट्विटर पर माल्दा सबसे ज्वलनशील चर्चा के रूप में उभर आया, और फेसबुक पर, क्षेत्र भर के लोगों द्वारा किसी भी मीडिया प्रसारण की कमी का रोना रोया जा रहा है। ट्विटर पर चहकने वाले लोग कुछ निश्चित बॉलीवुड कलाकारों की उनकी उदासीनता पर खोजबीन कर रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग, लेखकों और सक्रिय लोगों को शामिल करने वाला समूह, तीखी टिप्पणियों को प्राप्त कर रहा था। सोशल मीडिया सुशिक्षित समाज की मौन प्रतिक्रिया पर प्रश्न उठा रहा है कि वे अपनी संवेदनायें केवल तभी प्रकट कैसे कर सकते हैं जब किसी अल्पसंख्यक पर हमला होता है।

जैसे ही मुख्य धारा की मीडिया ने रफ्तार पकड़ी तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चर्चा में आ गयीं, उन्होंने ऐसी किसी भी घटना को नकारते हुये खारिज किया, इसे बीएसएफ और क्षेत्रियों लोगों के बीच तकरार का नाम दिया। इसने लोगों को क्रोधित कर दिया और दोषारोपण का दौर शुरू हुआ कि बनर्जी दोषी को एक अल्पसंख्यक तुष्टीकरण नीति के रूप में सुरक्षा देने कोशिश कर रही हैं।

Mamata Banerjee, Malda riots

लेकिन ऐसा लगता है कि बंगाल की मुख्यमंत्री के अपने मस्तिष्क में कुछ अलग ही चल रहा है। वह इस तथ्य के प्रति बहुत ही सजग है कि इस दंगे के समाचार से राज्य की छवि 7 जनवरी से शुरू होने वाले वैश्विक व्यवसाय समिति में बहुत खराब हो जायेगी। बंगाल सरकार निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है और साम्प्रदायिक भीड़ हिंसा का समाचार इस मामले में कोई भी सहायता नहीं करेगा। पीछे निगाह डालें तो, माल्दा घटना को चलते रहने देने का निर्णय एक अच्छा निर्णय था, क्योंकि यह किसी भी प्रभाव पर पर्दा डालने जैसा था जो राष्ट्र के सामाजिक ताने बाने को ज्यादा क्षति पहुंचा सकता था।

अपनी सरकार की इच्छा के अनुसार क्षेत्रीय संवाददाता माल्दा के बारे में चुप्पी साधे हुये थे, और इनके द्वारा कहानी की रिपोर्ट को एक कानूनी और आदेश समस्या के रूप में बतलाया गया। राज्य, पूरे तौर पर, नकारने की स्थिति में चला गया, जबकि हिंदू उन अल्पसंख्यक-प्रभावित क्षेत्र में हिंसा की उम्मीद से थरथरा रहा है। इस समय सरकार के लिये यह आवश्यक हो गया है कि वह कुछ तार्किक कदम उठाये जिससे कि साम्प्रदायिकता की यह आग राष्ट्रीय अस्मिता को प्रभावित न करे, साथ ही यह भी समान रूप से आवश्यक है कि जमीनी हकीकत को भी पता किया जाए और इस मामले में, हिंदुओं, के हितों की सुरक्षा की जाए!

 Malda riots

ममता बनर्जी की असहमति पर्याप्त स्पष्ट है। उन्होंने सुनिश्चित किया है कि बीजेपी द्वारा गठित ‘तथ्यों को पता करने वाली’ टीम दंगा प्रभावित क्षेत्र में यात्रा नहीं करेगी, कपट पूर्वक कहना कि यह भीड़ को उकसाने का कार्य करेगा। बंगाल के लिये एक निरंकुशता के रूप में ऐसा व्यवहार करना पर्याप्त शर्मनाक है और सत्य के सामने आने के डर से दरवाजा न खोलने जैसा प्रतीत होता है। ऐसा कदम शरारती तत्वों को बढ़ावा देने जैसा है, जो ममता के हर इंकार करने के कदम के साथ प्रोत्साहित होते हैं।

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