ब्रिटिश राज ने 7 गांवों के 300 परिवारों को विस्थापित करके राष्ट्रपति भवन को बनाया था

Posted on by Ridhi Sharma
 
  

आज जब हम भारत की राजधानी दिल्ली शहर में चर्चित माल्चा मार्ग, तालकटोरा रोड या कभी व्यस्त रहे मोतीबाग क्षेत्र के अतीत को खंगालते है, तो हमें शायद ही कोई ऐसा सबूत मिलेगा जो इन नामों से जुड़े इतिहास को बतायेगा।

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ये सभी 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में सम्पन्न गांव थे, जिन्हें ब्रिटिशों के द्वारा भारत के वायसराय के लिये शाही आवास को बनाने के लिये लिया गया था। आजादी के बाद वायसराय का आवास भारत के प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति, का आवास बना।

राष्ट्रपति भवन के चारों ओर पेशेवर तरीके से सजाये गये लॉन और साफ गोलाकार रास्ते जो अद्भुत उपनिवेशीय ढ़ांचे की ओर ले जाते है, सात गांवों: रायसीना, माल्चा, कुशक, पेलंजी, दासगढ़, तालकटोरा और मोतीबाग की जमीन पर बना है।

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1910 में, चार्ल्स हार्डिंग, भारत के कार्यकारी वायसराय, ने ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता (आज के कोलकाता) से दिल्ली स्थानांतरित करने का प्रस्ताव किया। इस क्रम में पंजाब सरकार के मुख्यसचिव ने पंजाब गजट में एक आदेश जारी कर नवम्बर 1911 में जमीन अधिग्रहण करने के लिये आदेश जारी किया। लगभग एक साल बाद 1912 में, इस प्रस्ताव के लिये सहमति दी गयी, और तब एकड़ों में भूमि की तलाश शुरू हुयी।

पांच सालों में, 1911 से 1916 के बीच, 300 परिवारों को “1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम” के अंतर्गत सात गांवों से विस्थापित कर 4000 एकड़ भूमि पर वायसराय के आवास निर्माण कार्य शुरू किया गया।

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हर्बर्ट बेकर ( बांयें) और एडविन लुटियंस ( दाहिने) वायसराय के आवास और सचिवालय को बनाने के लिये एक साथ काम करते हुये।

ब्रिटिश आर्कीटेक्ट, एडविन लैंड्सीर लुटियंस को मुख्य आर्कीटेक्ट के रूप में चुना गया था और वह अपने साथ अपने पुराने मित्र हर्बर्ट बेकर को भी साथ लाये थे। तब तक, लुटियंस इंग्लैंड में कंट्री हाउस पर काम कर रहे थे, बेकर अफ्रीका में एक शाही प्रोजेक्ट पर काम कर चुके थे। लुटियंस और बेकर, जिन्हें क्रमश: वायसराय आवास और सचिवालय का काम दिया गया था, के बीच एक मित्रता की शुरुआत हो गयी।

विस्थापित परिवारों को वादा किया गया था कि सरकार द्वारा धन और भूमि क्षतिपूर्ति के रूप में दिया जायेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और उन्हें एक फूटी कौड़ी भी नहीं दिया गया। डाउन टू अर्थ में एक हाल ही की खबर विस्थापित परिवारों के वंशजों से हरियाणा के सोनिपत जिले के एक गांव में मिली। यह गांव माल्चा पट्टी के नाम से जाना जाता है, केवल एक बात जो उन्हें याद दिलाती है वह केवल नाम है।

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जीत सिंह भरपाई पाने के लिये लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे ब्रिटिश भारत ने उनके पूर्वजों को देने का वादा किया था।

यहाँ माल्चा पट्टी में, 73 वर्षीय जीत सिंह प्रतिपूर्ति पाने के लिये लड़ाई लड़ रहे हैं जिसे ब्रिटिश भारत ने उनके पूर्वजों को देने के लिये वादा किया था। सिंह के अनुसार, माल्चा सातों गांवों में सबसे बड़ा था और विभिन्न समुदायों: सैनी, ब्राह्मण, नाई, कुम्हार, दलित, गुज्जर, मुस्लिम और जाटों के 189 परिवार उसमें रहते थे।

सिंह ने दुबारा दुहराया कि यह सम्बंध प्रामाणिक है, क्योंकि इस आदमी के पास उस समय के मुगल कार्यालय और ब्रिटिश लेखों की सभी छायाप्रतियां उपलब्ध हैं। जीमाबंधी के नाम से जाना जाने वाला, लेख भूमि मालिक की पूरी जानकारी, जैसे भूमि का क्षेत्र और इसकी प्रकृति, उपजाऊ है या बंजर है, को बताता है। यह लेख प्रत्येक चार वर्ष पर गांव के लेखाकार पटवारी द्वारा पुन: बनाया जाता है।

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सिंह का दावा है कि जिस भूमि पर राष्ट्रपति को रहने के लिये आलीशान घर बनाया गया है वह उनसे सम्बंधित है। पुराना भूमि अधिनियम जिसके अंतर्गत सरकार ने उस भूमि का अधिग्रहण किया, वह 2013 तक लागू था, जब तक भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनव्यर्वस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, जनवरी 2014 में इसकी जगह पर लागू हुआ।

ब्रिटिशों ने मुगल परम्परा के शजरा-ए-नसब( वंश वृक्ष) की परम्परा को बनाये रखा था। इस लेख के उपयोग से, सिंह ने अपने पूर्वजों का पता लगाया, जिनकी जमीनें माल्चा गांव में मालिकाना रूप में थी।

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वायसराय महल का एडविन लुटियंस का मूल चित्र

ब्रिटिश राज ने वहाँ के निवासियों को क्षतिपूर्ति भूमि का प्रस्ताव दिया था। परंतु, भूमि वहाँ से बहुत दूर मोंट्गोमरी जिले (वर्तमान में पाकिस्तानी पंजाब के साहीवाल), और कर्नाल में और रोहतक जिले में दिया गया था।

सबसे दुख:द यह था कि निवासियों को सिर्फ खाली वादे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिया गया था। विस्थापित निवासी आखिरकार हरियाणा में जाकर बसे और हरसाना और माल्चा की नींव रखी, जिसे उन्होंने खोने के बाद यादों में रखा था।

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सिंह और उनके वकील ने आरटीआई के अंतर्गत एक आवेदन को डाला था और यह जानकारी पाया कि क्षतिपूर्ति की धनराशि प्रादेशिक न्यायाधीश की अदालत में 1912-13 में जमा करायी गयी थी।

इन दोनों ने सभी न्यायिक घरों के दरवाजे पर जाकर खटखटाया, उच्चतम न्यायालय से लेकर प्रादेशिक न्यायालयों तक, लेकिन कोई भी संतोषजनक उत्तर अभी तक नहीं मिला है। सिंह उम्मीद करते हैं कि धन को राज्य की ट्रेजरी में जमा कराया गया हो सकता है।

1911 से लेकर भारत के इतिहास में अब तक कई बदलावों के साथ, यह तथ्य बाहर आया है कि कई हाथों से होते हुये यह धन अब राष्ट्रीयकृत बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास है। जबकि निवासी अभी तक मुकदमा लड़ रहे हैं, यह संदेहास्पद है कि उन्हें कोई धन मिल सकता है। हमें इस साल की 25 जुलाई तक इंतजार करना होगा, जब दिल्ली उच्च न्यायालय इस मामले की सुनवाई करेगा।

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