11.6 करोड़ बेरोजगार लोग भारत में हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ज्ञान के नेता के रूप में उभरने के सपने में, दृढ़ विश्वास की कमी महसूस हो रही है

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक अच्छे वक्ता है, और हर समय यह नेता शुद्ध हिंदी में अपना जनभाषण देते हैं, मैं सम्मोहित भी हो जाता हूं। प्रधानमंत्री का हाल ही में, श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय की यात्रा ने सैकड़ों छात्रों में आशाओं को भर दिया है जब उन्होंने अपने सामान्य आत्मविश्वास के साथ कहा कि भारत इक्कीसवीं सदी, “ज्ञान के युग”, में शासन करेगा।

उनके भाषण में आंकड़े भी तैयार थे कि, 800 मिलियन भारतीय युवा जो 35 साल से नीचे हैं भारत का भविष्य है, और हर एक युवा देश के विकास की कहानी लिखेगा। प्रधानमंत्री मोदी सही हैं कि यहाँ एक ज्ञान का युग शुरू हो चुका है, और भारत ने अपना रास्ता दिखा दिया है। उन्होंने छात्रों के उस उद्देश्य को यह कहते हुये छुआ कि केवल वह जिनके पास योजना है, इस आवश्यक प्रश्न “अब अगला क्या” के प्रश्न की चिंता करने की जरूरत नहीं होगी, जो नये ग्रेजुएट्स को उलझा देते हैं।

Narendra Modi, नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री का हाल ही में, श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय की यात्रा ने सैकड़ों छात्रों में आशा को भर दिया है जब उन्होंने अपने सामान्य आत्मविश्वास के साथ कहा कि भारत इक्कीसवीं सदी “ज्ञान के युग” में शासन करेगा।

लेकिन यह कहना कि भारत इस शताब्दी में शासन करेगा, भारतीय ब्रांड के बारे में बहुत अधिक आत्मविश्वास को दिखाता है जो जमीनी हकीकत को जाने बिना कहा गया हो। प्रधानमंत्री अच्छी तरह से जानते और समझते है, लेकिन उनके विचार में तत्वों की कमी है। बेरोजगार युवाओं की संख्या भारत में आश्चर्यजनक है और नरेंद्र मोदी जिस शांति फैला रहे है उसका बहुत छोटा आधार है।

ज्ञान हमेशा शिक्षा से सम्बंधित नहीं होता है। यद्यपि, शिक्षा की कमी बच्चों में विवेकपूर्ण विचार और जीवन को रचनात्मक तरीके से जीने से वंचित कर देती है। एक ऐसी शिक्षा प्रणाली जो बच्चों को शामिल करने से ज्यादा को छोड़ देती है, ऐसे में हम कैसे ज्ञान के साथ विश्व के ऊपर शासन करने को बढ़ावा दे सकते हैं, जब 3.2 करोड़ अशिक्षित युवा (2011 की जनगणना के अनुसार) बेरोजगार बचे है।

बहुत से शिक्षित युवा असंगत नौकरियां कर रहे हैं जो उनकी शिक्षा या अध्य्यन के क्षेत्र का उपयोग नहीं करती है।

अन्य साक्षर और शिक्षित युवा प्रतियोगी शिक्षा प्रणाली में अपने लिये सदैव एक कमी का अनुभव करते रहते हैं, और उनमें से बहुत अपने घरों में नौकरी के मौके के अभाव में अपने घरों पर मुरझाये से पड़े रहते हैं। उनमें से कई विषम कार्यों को करते रहते हैं जो उनकी शिक्षा या अध्य्यन के क्षेत्र का कोई भी उपयोग नहीं करते है। निश्चित रूप से यह प्रक्रिया युवा ऊर्जा की बहुत बड़ी बर्बादी को बढ़ावा देती है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा धक्का दे सकता है।

पिछले साल नवम्बर में प्रकाशित द हिंदू की एक रिपोर्ट कहती है कि 1 करोड़ भारतीय स्नातक, परास्नातक और तकनीकी डिग्री कार्य के लिये अलग अलग जगहों को देख रहे हैं। इसका मतलब है 15 प्रतिशत उच्च डिग्री शिक्षा वाले भारतीय 2011 में कार्य को ढ़ूढ़ रहे हैं। और सभी राज्यों में, केरल में सबसे अधिक स्नातक बेरोजगारी दर 30 प्रतिशत से भी अधिक है।

कोई आश्चर्य की बात नहीं है अगर इस क्षेत्र के लोगों के झुंड मध्य पूर्व में अच्छे वेतन वाली नौकरियों की खोज के लिये भेजे जाते हैं। भारत की बहुत पुरानी प्रतिभा पलायन की समस्या के अलावा, युवा ऊर्जा का बाहर की ओर बहाव भी हमारी अर्थव्यवस्था को अपाहिज बना रहा है। कुछ विदेशी डॉलर जो भारत में आ रहा है के अतिरिक्त, हम ज्ञान के संदर्भ में बहुत कुछ खो रहे हैं।

32 million illiterate youths remain unemployed in India

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 3.2 करोड़ निरक्षर युवा भारत में बेरोजगार बचे हैं

2011 जनगणना संख्या की सांख्यिकी पर हमारे प्रधानमंत्री को तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। मोदी के दो प्रमुख अभियान मेक इन इंडिया और स्टार्ट-अप इंडिया ने भारतीय उद्यमियों में बहुत उत्साह को भर दिया। दो अभियानों, जो प्रकृत्या एक दूसरे से जुड़े, ने हजारों युवा लोगों के उत्साह को बढ़ाया है। लेकिन वह ज्यादातर साक्षर और शिक्षित लोगों के लिये है।

भारत को ज्यादा परस्पर प्रभाव डालने वाली शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो समाज के निचले तबके से आने वाले युवाओं को शामिल करेगा, जो स्वयं की सहायता के ज्ञान से उन्हें शक्तिसम्पन्न करेगा और नयी खोजों के लिये उनके मस्तिष्क को उपजाऊ बनायेगा। और इसके लिये ठोस योजना चाहिये कैसे 11.6 करोड़ भारतीयों को नियोजित किया जाय जो या तो काम को खोज रहे हैं या काम के लिये तैयार खड़े हैं, उनमें से 3.2 करोड़ निरक्षर और 8.4 करोड़ साक्षर है।

ज्ञान, कुछ भी हो बुद्धिमत्ता की चाभी है, और भारत, जैसा मोदी ने कहा, अपने आप में मार्ग निर्माता है।

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