मारूती घोटाला: इंदिरा गांधी ने अपनी छोटी संतान संजय को एक कार कम्पनी को चलाने की अनुमति दे दिया, जिसने सात सालों में एक भी कार नहीं बनायी।

Posted on by Samiksha Pathak
 
  

संजय गांधी, इंदिरा गांधी की छोटी संतान, को कारों में विशेष रूचि थी। तीन सालों के बाद भारत में रॉल्स रायस के साथ इंटर्नशिप करने के बाद, जब संजय 1968 में भारत वापस आये, तब उन्होंने अपनी रानी मां से कार बनाने के सपने के बारे में बताया।

श्रीमती गांधी, जिन्हें अपने छोटे बेटे के प्रति विशेष झुकाव था, सहमति दे दिया, और 1990 में, प्रधानमंत्री की कैबिनेट ने सलाह दिया कि सस्ती ‘लोगों की कार’ लायी जाय, कुछ ऐसी जिसे लोग खरीदने में समर्थ हों, कार्यकुशल हो और सबसे बड़ी बात कि वह भारत में बनीं हो।

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संजय के पास किसी भी चलती कार माडल का खाका भी नहीं था, लेकिन उन्हें बेताज राजकुमार होने के कारण, अपनी मां के कार्यकाल में विशेष उत्पादन लाइसेंस प्राप्त हुआ था। जल्द ही, मारूती मोटर्स लिमिटेड बनाया गया था, और 1971 में, संजय ने कम्पनी के मैंनेजिंग डायरेक्टर की भूमिका को स्वीकार किया था। लेकिन मारूती के पास न तो कोई ढ़ांचा था जिस पर काम किया जा सके और न ही किसी कार निर्माता के साथ उत्पादन करने का अनुबंध था।

इसलिये सबसे पहले, संजय ने कार का एक नमूना तैयार किया। उन्होंने दिल्ली के गुलाबी बाग के पास की एक वर्कशॉप में चेसिस को बनाया, यहाँ पर ट्रकवालों का बहुत आना जाना होता था। इस मशीन में इस्तेमाल हुये बहुत सारे हिस्सों को विभिन्न जगहों से लाया गया था; कुछ भाग को जामा मस्जिद क्षेत्र से, एक मोटरसाइकिल के इंजन को कार चलाने के लिये लाया गया था। कुछ अन्य भागों को मिलाने के बाद, कार को अहमदनगर में चलाया गया था, लेकिन यह जांच सफल नहीं रही थी।

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फिर भी इंदिरा गांधी, एक गौरवांवित अभिभावक की भांति, इस कच्चे काम के नमूने को सफलता का मॉडल बतलाया। लेकिन उनका इस बेकार की बात को करने की कोशिश को जनता द्वारा समर्थन नहीं मिला। जल्द ही, संजय की टुकड़ी चारों तरफ जमीन की तलाश में लग गयी।

हरियाणा के मुख्यमंत्री, बंशी लाल, श्रीमती इंदिरा गांधी को नाराज़ नहीं करना चाहते थे, ने मारूती को किसानों की जमीन औने पौने दाम पर दे दिया। इसी बीच, संजय ने वोल्क्सवैगन से भारत में बीटल का उत्पादन करने के लिये सम्भव समझौते की कोशिश को भी किया। लेकिन बातचीत असफल रही।

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1974 में, जब भारत में आपातकाल को घोषित किया गया था, संजय गांधी ने गैरसरकारी रूप में प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार की भूमिका को निभाया था, और अपने राजनैतिक बल का उपयोग करके बैकों और निवेशकों को अपने उपक्रम में पैसा लगाने के लिये दबाव डाला था।  अनिच्छुक निवेशकों और बैंक कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था और सलाखों के पीछे फर्जी आरोपों को लगाकर भेज दिया गया था। उसी साल, कांग्रेस सरकार ने मारूती को 50,000 कार उत्पादन का औद्यौगिक लाइसेंस भी प्रदान कर दिया था।

एक एक्ज़ीक्यूटिव जो सिंघानिया कम्पनी की एक कम्पनी में कार्यरत था, उसको भयावह मीसा (मेंटीनेंस ऑफ इंटर्नल सेक्यूरिटी एक्ट) के अंतर्गत नवम्बर 1975 में गिरफ्तार कर लिया गया था, बाद में उसके कारावास को कंज़र्वेश ऑफ फॉरेन एक्स्चेंज एंड प्रिवेंशन ऑफ स्मगलिंग एक्ट के अंतर्गत बनाये रखा। कारावास आदेश को सिंघानियाओं में से एक को मीसा के अंतर्गत जारी किया गया था।

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जिस दिन से सिंघानिया परिवार व्यवसाय के साथ जुड़ा, उसी दिन से मारूती के शेयर को खरीदना शुरू कर दिया, उस एक्ज़ीक्यूटिव और उसके परिवार के सदस्यों को छोड़ दिया गया था। एक अन्य डीलर जिसने अपनी जमा राशि को वापस मांगा था क्योंकि अभी तक कोई कार नहीं बनी थी, उसे गिरफ्तार कर लिया गया था और दो महिने के लिये जेल में बंद कर दिया था।

एक भी कार मारूती द्वारा अपने स्थापित किये जाने वाले वर्ष 1971 से उस समय तक नहीं बनायी जा सकी थी। जब इंदिरा गांधी 1977 में सामान्य चुनाव हार गयी थीं, तब विपक्षी दल ने, जनता दल के नेतृत्व में कार कम्पनी को बंद कर दिया।

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मारूती ने संजय गांधी की 1980 में हवाई दुर्घटना में मौत होने तक कोई भी उत्पादन नहीं किया था। इंदिरा गांधी, जिन्होंने तब तक अपनी प्रधानमंत्री की गद्दी को पुन: प्राप्त कर लिया था, अरूण नेहरू के साथ चर्चा करने के बाद, निर्णय लिया गया कि इसमें पेशेवर कुशल लोगों को लगाया जाय जो दिवंगत पुत्र के सपने को पंख दे सके।

बहुत सारी जांच पड़ताल और यात्रा के बाद, इंदिरा के लोग जापानी मोटर निर्माता सुज़ुकी को ले आये जिसने संजय के नमूने को काटा छांटा और भारतीय सड़कों पर चलने लायक एक कार को बनाया। और अंतत: 1983 में मारूती 800 सड़कों पर पहली बार आयी।

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