भारतीय सेना को उन सभी मामलों के लिये राजनीति में घसीटना एक बहुत बड़ा विश्वासघात है जिसके लिये वह जानी जाती है।

Posted on by kapil
 
  

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का भारतीय सेना के साथ हाल ही में दिवाली कै मौके पर जुड़ाव ने राहुल गांधी के चिरपरिचित प्रतिक्रिया को शुरु कर दिया. एक अच्छी छवि को चुराने की कोशिश में और यह दिखाने के लिये उन्हें सेना की कितनी परवाह करते हैं, उन्होंने वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) और अपंगता पेंशन तंत्र के मुद्दे को उछाला, सरकार से यह कहते हुए कि इन्हें ज्यादा सार्थक और सैन्य बलों के हित में बनाया जाय। उन्होंने मोदी को बाधाओं को खड़ा करने के लिये दोषी भी ठहराया।

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एक ऑनलाइन टिप्पणीकर्ता महसूस करता है कि राहुल को अपना समय उन जगहों पर नष्ट नहीं करना चाहिये जिससे कि उनका कोई सरोकार नहीं है कई लोगों ने तो ओआरओपी पर राहुल की समझ पर भी सवाल उठा दिया है। लेकिन सभी आरोप सिर्फ एक पार्टी पर ही क्यों लगाये जा रहे हैं जो कुछ ही वर्षों से शासन में आयी है जबकि कांग्रेस, पिछले 50 सालों के शासन में, इस संवेदनशील मुद्दे का हल निकालने में असफल हो गयी थी। अतीत में ऐसे कई मौके मिल चुके हैं जिसमें कांग्रेस ने भारतीय सेना के हितों की अंदेखी को किया है।

1962 में, नेहरू ने प्राण लेने वाले निर्णय को लिया था जब वह उन जवानों को पर्याप्त मात्रा में हथियार उपलब्ध कराने में असमर्थ थे जिन्होंने चीनियों से पुराने सामानों के साथ लड़ते हुये अपनी जान दिया था। उस समय 1971 के युद्ध के बाद, इंदिरा गांधी ने 93000 कैदियों की एक पलटन को मुक्त और समझौता करने के अथाह समार्थ्य का समर्पण किया वह भी बिना कुछ पाये और फिर 26/11 का समय आया जब हमारी पुलिस ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय की राइफल का प्रयोग किया।

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बहुत सारी रिपोर्टें जवाहर लाल नेहरू के ऊपर 1962 के युद्ध में हार का आरोप लगाती है

निश्चित रूप से, सेना क्या हमारे राजनीतिज्ञों द्वारा एक व्यक्ति के निर्दयी कृत्य के कारण ज्यादा व्यथित नहीं हो सकती थी, जबकी सभी पक्ष सेना को बहुत अधिक प्रेम करने का दावा करती हैं। यह एक ऐसा संस्थान है जिसे राजनैतिक ऊंचाइयों को प्राप्त करने के साधन के रूप में प्रयोग करने से दूर रखा जाना चाहिये, लेकिन ऐसा होता नहीं है। भारतीय सेना एक स्वैच्छिक बल है जो एक गैर राजनैतिक और पेशेवर छवि को धारण करता है।

जम्मू कश्मीर में पाकिस्तानी ठिकानों पर हुये “सर्जिकल स्ट्राइक” के बारे में सबसे दुखद यह है कि भारतीय सेना को राजनीति में घसीटने की कोशिश की गयी है। और दोनों शासन करने और विपक्षी पार्टियां इसके लिये बराबर से जिम्मेदार हैं। यहाँ तक कि सेना से सेवानिवृत्त हो चुके सैनिकों ने इसका लाभ लेते हुये देखा और सुना।

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सेना के मामलों को राजनैतिक रंग देना निश्चित रूप से कांग्रेस के खेल का अंत कर देगा।

लेकिन राजनैतिक दल अब बहुत ज्यादा लोगों को बेवकूफ नहीं बना सकती है क्योंकि आज भारतीय, राजनीति के मामलों बहुत अधिक जागरूक हो चुके है। लोग आसानी से अंतर कर सकते है कि किसे जनता के सामने छवि बनाने के लिये उपयोग किया जा रहा है और क्या सही है।

मोदी का लगातार संवाद और मीटिंग भारतीय सेना के साथ एक अच्छी चीज़ है, यह सेना को नैतिक रूप से बल प्रदान करेगा। हालांकि सेना उन नेताओं का आदर और सम्मान करती है जो जनता के प्रति ज्यादा वफादार और वर्दी में रहने वाले लोगों के सम्पर्क में लगातार रहते हैं। यह एक ऐसा कार्य है जिसे सभी के द्वारा सराहा जाना चाहिये चाहे वो विपक्षी दल ही क्यों न हो। कांग्रेस के लिये अच्छा होगा, कि वह लापरवाही से मुद्दों को उछालने से बचने की कोशिश करे क्योंकि यह किसी मामले का समाधान नहीं है, केवल विरोधों को बढ़ायेगा।

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