परास्नातक उत्तीर्ण लोग उत्तर प्रदेश में झाड़ू लगाने वाली नौकरी के लिये आवेदन कर रहे हैं। पूरे देश में, शिक्षित युवा जीवनयापन के लिये चतुर्थ ग्रेड के लिये आवेदन कर रहा है।

Posted on by kapil
 
  

पांच लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने सफाई कर्मचारियों के 3275 पदों के लिये कानपुर नगर निगम में आवेदन किया है, टीओआई ने हाल ही में इसे प्रकाशित किया था। और उनमें से, बहुत से स्नातक और परास्नातक उत्तीर्ण थे। विडम्बना यह है कि, संविदा सफाईकर्मी की नौकरी के लिये किसी भी शैक्षिक योग्यता की जरूरत नहीं होती है। यह चौकाने वाली बात नहीं है कि हजारों शिक्षित लोग इन दिनों चतुर्थ ग्रेड की नौकरियों के लिये इच्छुक है, चाहे वह एक कुली या सफाई कर्मी की ही नौकरी क्यों न हो। आकर्षित करने वाला तथ्य यह है कि वह सरकारी नौकरी होना चाहिये।

भारत में बेरोजगारी एक प्रबल मुद्दा है, और लोग अब इसका नियमित उपचार सरकारी नौकरी के रुप में पाकर करना चाहते हैं। ऐसा क्यूं हो रहा है कि स्नातक और परास्नातक उत्तीर्ण लोग ऐसी नौकरी को करने से शर्मा नहीं रहे हैं जिसमें उनको गंदगी साफ करने की जरूरत है। क्या जाति-संवेदनशील उत्तर प्रदेश में लोग जाति बाधाओं को तोड़कर ऐसी नौकरी को करना चाहते हैं जो बरसों से केवल शूद्र और दलित के लिये छोड़ी गयी थी?

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पांच लाख उम्मीदवारों ने सफाई कर्मचारी के पद के लिये केवल कानपुर में आवेदन किया है

दलित जैसे वाल्मीकि समुदाय पीढियों से सफाई के काम को करता चला आ रहा है। तो अब क्यूं लोग इस नौकरी के लिये आवेदन कर रहे हैं जो कभी इनके ऊपर अपनी भौंहे टेढ़ी करते रहे हैं? आलोचना करने वाले इसके लिये उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं, यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि यह स्थिति केवल कानपुर तक ही सीमित नहीं है।

जनवरी में, पंजाब के भटिंडा जिले में इसी स्थिति का सामना किया गया था, जहाँ 8500 आवेदन चतुर्थ श्रेणी के 19 पदों के लिये प्राप्त किये गय थे। इन आवेदको की योग्यता एमबीए से लेकर एमसीए तक की थी। उसी महीने में 17000 युवाओं ने सफाई कर्मचारी के 114 पदों के लिये उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में आवेदन किया था। निगम ने इन आवेदनो को एमबीए, बीटेक और बीएससी स्नातको से प्राप्त किया था, जो 17000 रूपये में सफाई कर्मी के रूप में कार्य करने के लिये तैयार थे।

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एमफिल, बीटेक, एमसीए, सभी एक लाइन में भटिंडा में चपरासी के पद के लिये

जून में, 50 प्रतिशत आवेदक या 984 स्नातक और पांच एमफिल डिग्री प्राप्तकर्ताओं ने महाराष्ट्र में ‘हमाल’(पोर्टर) के पद के लिये आवेदन किया था। डी वर्ग के पद के लिये न्यूनतम शैक्षिक योग्यता कक्षा चार पास की थी।

सम्पूर्ण भारत की स्थिति बहुत ही निराशाजनक लगती है। किसी विशेष राज्य की शिक्षा प्रणाली के साथ करने के लिये बहुत कुछ नहीं है। यहाँ नये अवसरों की बहुत कमी है, जहाँ शिक्षित युवा अपनी प्रतिभा का उपयोग कर सकें। सही मौके की कमी के बीच, लोग ऐसे कामों को करने से भी नहीं हिचक रहें हैं जो समाज में निचले तबके का माना जाता है।

बेरोजगारी, प्राईवेट नौकरी की असुरक्षा और स्थानांतरण की परेशानी ऐसे कुछ मुद्दे हैं जो प्रोफेशनल डिग्री लेने वालों को सफाई कर्मचारी की नौकरी करने के लिये मजबूर कर रहा है।

भारत में नौकरी और शिक्षा के बीच मांग और आपूर्ति का अंतर बहुत बड़ा है

यूनेस्को के अनुसार, भारत की सम्पूर्ण साक्षरता दर 72.1% है। लेकिन मांग और आपूर्ति का अंतर शिक्षा और नौकरी के बीच स्तब्ध करने वाला है। दस मिलियन स्नातक, परास्नातक और टेक्निकल डिग्री लेने वाले भारतीय काम की तलाश में हैं, कहने का मतलब है कि सभी भारतीयों का 15% शिक्षा के सर्वोच्च स्तर के साथ, 2011 के अनुसार, नौकरी को ढ़ूढ़ रहे थे। केरल में भारत की सबसे अधिक स्नातक बेरोजगारी दर 30% से अधिक की पायी जाती है। ये आंकड़े 2011 के नये जनगणना को द हिंदू द्वारा विश्लेषित संख्या से लिये गये हैं।

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