जवाहर लाल नेहरू सन्युक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के शामिल न किये जाने के लिये उत्तरदायी नहीं थे

Posted on by kapil
 
  

बहुत कुछ ऐतिहासिक साक्ष्य के बारे में लिखा जा चुका है जिसने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व के अंतर्गत युवा स्वतंत्र भारत के इतिहास को आकार दिया था। नेहरू के बारे में अफवाह और तथ्य कुछ इस तरह से कीचड़ फैला रहे हैं कि सत्य को झूठ से अलग कर पाना कठिन है। एक ऐसी ही कहानी है जो नेहरू के लिये नहीं होना था, लेकिन भारत यूएनएचसी (सन्युक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) का सदस्य और एक वैश्विक स्तर पर नाभिकीय शक्ति का नेता हो चुका होता।

Jawaharlal Nehru with Zhou Enlai (left), at the Bandung conference, 1955.

जवाहरलाल नेहरू, झॉउ एनलाई( बाये) के साथ बांडुंग सम्मेलन 1955 में

सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत भारत को यूएनएससी सदस्य न बन पाने के पीछे दिया जाता है वह जवाहरलाल नेहरू द्वारा, अपने आदर्शात्मक अक्खड़पन में, प्रस्ताव को इंकार करना और इसके बजाय चीन के नाम पर सलाह देना था। इस बात पर प्रश्न यह उठता है कि यूएनएससी को 1945 में बनाया गया था, भारत की आज़ादी से दो साल पहले और इसके बनाये जाने से लेकर अबतक इसकी संरचना में परिवर्तन नहीं हुआ है।

जिस समय सन्युक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन हुआ था और 1945 में सन्युक्त राष्ट्र में सीटों का आबंटन किया गया था, तबतक भारत ब्रिटिश शासन के अंतर्गत था। और अगर कभी भारत को परिषद का सदस्य बनाये जाने के बारे मे कोई आवाज़ उठी भी तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने एक स्वर में नकार कर मामले को खारिज़ कर दिया। भारत और यहाँ रहने वालों के लिये उनकी घृणा जग प्रसिद्ध है।

Nehru - thevoiceofnation

जॉन एफ कैनेडीऔर जवाहरलाल नेहरू

बहुत बाद, सितम्बर 1955 में, नेहरू से लोक सभा में प्रश्न पूछा गया कि सन्युक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की सहभागिता में उनकी क्या भूमिका थी। उन्होंने कहा: “ ऐसा कोई भी प्रस्ताव औपचारिक या अनौपचारिक किसी भी प्रकार का नहीं था। कुछ अज्ञात स्रोत प्रेस में इस बारे में प्रकट हुये हैं, जो तथ्यों के आधार पर कही भी ठहरते नहीं है। सुरक्षा परिषद की संरचना को सन्युक्त राष्ट्र संविधान द्वारा बनाया गया है, जिसके अनुसार कुछ निश्चित निर्दिष्ट राष्ट्र स्थायी सीटों को प्राप्त किये हुये हैं। इसमें कोई भी परिवर्तन या नये सदस्य को जोड़ना इसके संविधान में संशोधन किये बिना सम्भव नहीं है। अत:, कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि किसी सदस्यता का प्रस्ताव होता और भारत उसे मना करता” ।

हमने विद्यालय में अपनी सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में पढ़ा है कि यूएनएससी में बदलाव करने के लिये बहुत लम्बी और औपचारिक प्रक्रिया है। इसकी शुरूआत यूएन के संविधान में संशोधन के साथ होती है जिसके लिये इसके सामान्य सदस्यों में से दो तिहाई के समर्थन के साथ पांच बड़े सदस्यों का समर्थन आवश्यक है। अगर नेहरू ने स्वतंत्रता मिलने के बाद परिषद में जगह पाने की इच्छा प्रकट किया होता, तब भी भारत के लिये यूएनएससी में जगह पाने की राह आसान नहीं होती।

 Jawarhalal Nehru, United Nations

भारत के प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू, सन्युक्त राष्ट्रके मुख्यालय पर 21 दिसम्बर 1956 को

यूएनएससी पर चर्चा के अतिरिक्त, नेहरू को नाभिकीय क्षेत्र में शक्तिहीन होने के लिये दोषी ठहराया जता है। लेकिन सत्य कुछ अलग ही है, नेहरू भारत के नाभिकीय शक्तिसम्पन्न राज्य बनने के खिलाफ नहीं थे। अप्रैल 1948 में, जब भारत नेहरू के नेतृत्व में था, नाभिकीय ऊर्जा अधिनियम को पास किया गया था, जिसने अंतत: भारतीय नाभिकीय ऊर्जा आयोग (आईएईसी) की स्थापना करवाया।

नेहरू ने कहा था: “हमें इस नाभिकीय ऊर्जा का विकास युद्ध से अलग हट कर करना चाहिये- वास्तव में मैं ऐसा सोचता हूं कि हमें इसका विकास शांति उद्देश्यों के लिये करना चाहिये। नि:संदेह, अगर हम एक राष्ट्र के रूप  में इस बात के लिये कटिबद्ध हो जायें कि इसका उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिये करना है, सम्भव है हम सबके बीच से कोई भी धर्मपरायण व्यक्ति राष्ट्र को उस रास्ते पर जाने से रोक नहीं पायेगा” (वेपंस ऑफ पीस, राज चेंगपा)

Dr. Homi Bhabha and Jawaharlal Nehru

होमी भाभा और जवाहरलाल नेहरू ट्रॉम्बे नाभिकीय संयंत्र पर

नेहरू ने अमेरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी को भारत के नाभिकीय स्थिति के लिये प्रभावित नहीं किया था। अमेरिका ने भारत के नाभिकीय कार्यक्रम को अप्रकट तरीके से समर्थन देने से यह कहते हुये मना कर दिया था, कि किसी नाभिकीय स्थापना को समर्थन देना उनके नीति के बाहर था।

स्रोत: Firstpost

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