केजरीवाल को मोदी के साथ में होने से कुछ तो हो रहा है। उन्होंने अपनी अच्छी समझ को खो दिया है।

Posted on by kapil
 
  

अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी की उड़ान के साथ छेड़खानी और रूखा व्यवहार का आनंद उठाते है। लगभग ऐसा महसूस होता है नरेंद्र मोदी उनके पूरक है, और उनके जीवन को सार्थक बना रहे है।

दिल्ली हाईकोर्ट के स्वर्ण जयंती समारोह को मोदी और अन्य सम्मानीयों की उपस्थिति में सम्बोधित करते हुये, दिल्ली के मुख्यमंत्री ने उस समय बम का पिटारा खोल दिया जब उन्होंने आरोप लगाया कि जजों के फोन को भी टेप किया जा रहा है। इस बात ने कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद को उग्रता से नकारने के लिये मजबूर कर दिया कि ये दावा तथ्य विहीन है।

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(बायें से दायें) किरन बेदी, अरविंद केजरीवाल, राजनाथ सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

केजरीवाल ने स्वीकार किया कि वह सुनिश्चित नहीं है कि इस बात में कितनी सच्चाई है, लेकिन उन्होंने कुछ न भी किया हो तब भी चिंता और असहजता का वातावरण बना दिया है। यह बहुत ही गम्भीर आरोप है, और जब तक साक्ष्यों के साथ प्रमाणित नहीं हो जाता है, खुलेआम ऐसा नहीं बोलना चाहिये था। शायद, उनकी इच्छा मोदी के लिये समस्या को खड़ा करना ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाय एक अच्छी समझ को दिखाना।

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न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर भारत के 43 वें और वर्तमान मुख्य न्यायाधीश

यह एक अच्छी चाल थी, यद्यपि, समय का सदुपयोग भी मायने रखता है। शुक्रवार को, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, टी.एस.ठाकुर, केंद्र सरकार के ऊपर भड़क गये थे, क्योंकि कॉलेजियम द्वारा नामों को प्रस्तावित करने के बावजूद हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को नियुक्त नहीं किया जा रहा था। यह नुकसान पहुंचाने वाला अभियोग था जिसने मोदी नेतृत्व वाली सरकार को हिला दिया। इसका समाधान भी शर्मिंदा करने वाला था क्योंकि इसके विपक्ष में एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी द्वारा, केंद्र की ओर से, दिया गया बयान तार्किक रूप से बहुत मजबूत नहीं था। सरकार को इससे अधिक अच्छा कदम उठाना चाहिये था।

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कोई नहीं जानता कि अरविंद केजरीवाल सही है या नहीं लेकिन एक क्रोधावेश को उठा दिया

शायद, इन मुद्दों को ज्यादा गम्भीरता से लिया जाना चाहिये था और केजरीवाल से उनके दावों को पुष्ट करने के लिये भी पूछा जाना चाहिये। इस तरह के गम्भीर आरोपों को लगाने के उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हुये, उन्हें चाहिये कि कुछ तथ्यात्मक वर्णनों को प्रस्तुत करें जिन्हें उन्होंने सम्मानीय न्यायाधीशों के बीच होने वाली फुसफुसाहट से सुनने का दावा किया था। अन्यथा यह केवल केजरीवाल जैसे साहसी लोगों द्वारा लगाया गया आधारविहीन, कहे सुने पर आधारित, आरोप को लगातार बनाया जाता रहेगा।

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