‘आपातकाल’: जिसे इंदिरा गांधी ने 40 साल पहले किया था फिर से दोहराया नहीं जाना चाहिये!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

मेरा जन्म आपातकाल शुरू होने से ठीक पहले हुआ था। मैं अनुमान लगता हूं कि इंदिरा गांधी ने नवजात पर मुक्का चलाया था…..

ठीक 40 साल पहले 25 जून 1975 को, इंदिरा गांधी ने भारतीय लोकतंत्र की हत्या की थी। अपने सत्ता खो देने के डर से, उन्होंने भारत में आपातकाल लगाया था और इसे अपने नियंत्रण में सभी अधिकारों को रखने द्वारा दबावपूर्वक लगाये रखा। दिन प्रतिदिन क्षरण और घटने द्वारा 21 महीनों के लिये लोकतंत्र मरा पड़ा रहा।

आपातकाल प्रारम्भ होने के पहले और उनके 60 के दशक के अंत और 70 के दशक के पहले अत्याचारपूर्ण शासन के दौरान, इंदिरा गांधी को भारत और भारत को इंदिरा गांधी का पर्याय माना जाता था। अतिशक्तिशाली और लालच, आत्म-आसक्ति से भरी और नियंत्रण की चाहत, ‘भारत की लौह महिला’ सभी को अपने आगे नतमस्तक कराना चाहती थी, अपने आपको अविवादित शासिका के रूप में स्वीकार करवाया। जितना ज्यादा उन्हें मिला, उतना ज्यादा उनकी चाहत बढ़ी, भले ही यह भारत के लोकतंत्र के धागे को नष्ट कर रहा हो।

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1967 और 1971 के बीच, इंदिरा ने स्वच्छंद शक्ति का आनंद उठाया। वह धौस दिखाने वाली बनी और सभी को उत्पीड़ित किया, विशेषरूप से उनको जो उनमें विश्वास नहीं करता था। इंदिरा अपनी कैबिनेट के साथ किसी भी निर्णय पर चर्चा करने में विश्वास नहीं करती थीं, वे सभी केवल संख्या भरने के लिये कठपुतली थे।

स्वयं कांग्रेस में, इंदिरा ने हर असहमति के स्वर को धो डाला। इंदिरा की कांग्रेस एक अलग नस्ल की थी। वहाँ आंतरिक लोकतंत्र का कोई विचार नहीं था। कांग्रेस सदस्यों ने जल्द ही एहसास किया कि अगर वे राजनीति में ऊपर उठना चाहते हैं तो उन्हें इंदिरा की तरफ होना पड़ेगा। चाटुकारिता का अभद्र प्रदर्शन सामान्य हुआ।

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‘भारत की महरानी’ के रूप में उनका वर्णन उपयुक्त लग रहा था। उन्होंने भारत के संविधान को अपने अनुसार बनाने के लिये जब तब परिवर्तन किया। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में एक बार कहा था कि संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार नहीं है अगर वह संशोधन मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।

लेकिन इंदिरा गांधी उस स्तर तक ऊपर उठ चुकी थी जहाँ पर उनके लिये किसी का कोई मतलब नहीं था। उच्चतम न्यायालय के इंदिरा विरोधी फैसले को शून्य करने के उद्देश्य से, संसद ने, इंदिरा गांधी के प्रभुत्व में, 1971 में 24 संविधान संशोधन पारित किया। उन्होंने उच्चतम न्यायालय को उनके विरुद्ध कार्य के लिये ललकारा और लगातार बदलाव किया जब कभी वह खुश हुई।

आज के समय और युग में, यह अकल्पनीय है कि एक राजनैतिज्ञ सिर्फ अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिये इतना बड़ा नुकसान कर सकता है।

इंदिरा गांधी की भयंकरता के विरूद्ध विरोध की लहर एक-एक कर आती रही है, लेकिन वे सभी तत्काल और निदानों से बिखर गये थे। जयप्रकाश नारायण का आंदोलन उस समय सबसे महत्वपूर्ण बना। जेपी आंदोलन जो आपातकाल की शुरुआत का परिणाम था।

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अत्याचार, उत्पीड़न और दमन का शासन आपातकाल में घटित हुआ।

अत:, आपातकाल के दौरान क्या हुआ था?

भारत के अंधकार के घंटों में, इंदिरा गांधी ने सबसे पहले भारतीय प्रेस के लिये विद्युत आपूर्ति रोक दिया। मीडिया का गला घोटने और नियंत्रण के साथ, इंदिरा ने सुनिश्चित किया कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनके कपटी रूप के बारे में अनभिज्ञ बना रहे। मोबाइल फोन और सामाजिक माध्यम की अनुपस्थिति ने इस परिस्थिति में सहायता किया।

उन्होंने सभी चुनावों को निरस्त और शून्य कर दिया जिनको किया जाना सुनिश्चित किया गया था। उन्होंने सभी राजनैतिक विरोधियों को गिरफ्तार करने और जेल भरने का अदेश दिया। जिस किसी का भी स्वर विरोध में उठता था उसे गिरफ्तार करके कैद कर लिया जाता था। नेता जैसे जॉर्ज फर्नांडिज़, अटल बिहारी वाजपेयी, एल के आडवाणी, सुब्रमणियम स्वामी और अन्यों को जंजीर में बांध कर सलाखों के पीछे फेंक दिया गया।

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उस समय के किसी नेता ने उस समय कहा था: “जेल में जीवन काफी कठिन हो गया था। इंदिरा गांधी ने हमारी खुराक आधी कर दी थी। खाना खाने योग्य नहीं था, कीड़ों से भरा था। रोटियां बहुत कड़ी थी जिसे हम आग जलाने के काम में लाते थे और चाय बनाते” । 21वीं सदी की कांग्रेस, इस तरह की घृणा योग्य कहानियों के साथ, भारत के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को नुकसान पहुंचाने का आरोप दूसरों पर लगाने से पहले याद करके सोचना चाहिये।

बहुतों को, जिन्होंने अपने विरोध करने वाले साथियों के नाम का खुलासा करने से मना कर दिया, को कठोर मीसा(आंतरिक सुरक्षा बनाये रखने का अधिनियम)के अंतर्गत आरोपी बनाया गया, जिसमें कैदियों को अनिश्चित काल तक बिना कोर्ट के सम्मुख प्रस्तुत किये जेल में रखा जाता था। इसमें इंदिरा के आदमी थे, जो उनके आदेश पर काम करते थे। दिलचस्प यह है, ऐसी बहुत सारी घटनाये भी है जहाँ पुलिस अधिकारियों ने उन लोगों का साथ दिया जिन्होंने इंदिरा का विरोध किया था। यहाँ तक कि वे समझते थे कि जो वह कर रही हैं वह हर तरह से गलत है।

सबसे भयावह यह था कि, इंदिरा गांधी ने कई मौकों पर संविधान में संशोधन किया यह सुनिश्चित करने के लिये कि ‘न्यायपालिका के बजाय कार्यपालिका में शक्ति निहित होना चाहिये’, जिससे वह उच्चतम न्यायालय में फिर कभी कोई मुकदमा नहीं हारेंगी।

नागरिक स्वतंत्रतायें रोक दी गयी थीं और हर नागरिक को संदेह की निगाह से देखा जा रहा था। सेना और पुलिस सम्पूर्ण देश में नियुक्त की गयी थी और हर जगह गड़बड़ी फैली हुई थी! इंदिरा गांधी ने आज्ञा द्वारा शासन किया था और स्वतंत्रता सभी अर्थों में खत्म हो चुकी थी।

आतंक और खलबली के वातावरण में भारत घिरा हुआ था और लोग सरकार के प्रति अपनी दुर्भावना की आवाज़ निकालते हुये डरते थे। वे लोग जो अपने व्यवसाय को 5 बजे के बाद खुला रखते थे उन्हें गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया जाता था। पीड़नोन्माद की संवेदना इतनी अधिक थी कि कोई नहीं जानता था कि पुलिस कब दरवाजा खटखटायेगी।

समय द्वारा कई अन्य अत्याचार की सूचनायें मिली, जिसमें बहु-बंध्यीकरण (नसबंदी) आंदोलन शामिल था, प्रधानमंत्री के पुत्र संजय गांधी द्वारा नेतृत्व किया गया था। यह सूचित किया गया था कि संजय गांधी, अपने समय के सबसे डरे गांधी, ने लाखों युवाओं को वंध्यीकरण से गुजरने के लिये दबाव बनाया। भारत की बढ़ती जनसंख्या को रोकने का विचार था, लेकिन बड़े ही निंदनीय तरीके से अंज़ाम दिया गया।

यह बहुत बड़े पैमाने पर आवश्यक बंध्यीकरण कार्यक्रम था। आप इससे बच नहीं सकते थे। 1976-77 में, इस कार्यक्रम के अंतर्गत 83 लाख बंध्यीकरण की संख्या गिनती में पायी गयी, पिछले साल से 27 लाख अधिक! इसकी कल्पना करना कठिन और दर्दनाक है कि क्या हो रहा था।

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आपातकाल खत्म होने की शुरुआत!

दूरदर्शिता में, यह गलत था, लिया गया गलत निर्णय था जो भारत की कंजूसी और शर्म के अंत पा आ गया। इंदिरा गांधी ने मार्च में चुनाव की घोषणा किया और सभी राजनैतिक बंदियों को मुक्त कर दिया।

अंधकार के महीनों के बाद, आधिकारिक रूप से 23 मार्च 1977 को खत्म हुआ। विपक्षी जनता आंदोलन के प्रचार से भारतीयों को सलाह दिया कि इंदिरा गांधी को उनके गलत कार्यों के लिये सजा मिलनी चाहिये। उन्होंने लोगों को अपना भाग्य बदलने के लिये इस चुनाव का उपयोग करने के लिये कहा। उन्हें लोकतन्त्र और तानाशाही तंत्र के बीच चुनने के लिये कहा। यह एक आसान चुनाव था।

इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों को लोक सभा चुनाव में भारी हार उठानी पड़ी, मार्च 1977 में किया गया था। कांग्रेस कई राज्यों में साफ हो गयी थी और उनकी संख्या 153 तक सिमट गयी, जिसमें से 92 दक्षिण के चार राज्यों से थे। जनता पार्टी की 298 और सहयोगी दलों की 47 सीटों (कुल 542 में से) ने बहुत बड़ा बहुमत दिया और मोरारजी देसाई भारत के प्रथम गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।

दुर्भाग्य से, हमारी न्याय वितरण प्रणाली वापस आने पर बदतर हो गयी थी। आपातकाल के युग में सरकारी अधिकारियों और कांग्रेसी नेताओं द्वारा मुकदमों और अपराधों को हटाने के लिये जनता प्रशासन के सभी प्रयास असफल रहे जिसका कारण अक्षम, जटिल और राजनीति प्रेरित देरी की प्रक्रिया थी।

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1 Comment so far. Feel free to join this conversation.

  1. आनन्द वर्मन April 2, 2017 at 10:37 pm -

    इतिहास न दोहराये जाने की सलाह कहां तक सही है?
    अधिकतम सशक्त केन्द्रीय सत्ता का दुरुपयोग, ऐतिहासिक
    परिवर्तन के लिए बहुत जरुरी है।

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