श्यामा प्रसाद मुखर्जी हम जानते है कि आपका ‘कत्ल’ शेख अब्दुल्ला और नेहरू द्वारा रची गयी साजिश थी

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 1953 में श्रीनगर में हुई मृत्यु आज तक रहस्य से घिरी हुई है और 60 से अधिक सालों से, कांग्रेस उनकी मृत्यु की जांच के सारे प्रयासों को कमजोर कर रही है और उनकी मृत्यु के आस पास के रहस्य को जानबूझकर छुपाने की कोशिश कि गयी ।

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ऐतिहासिक साक्ष्यों और लेखों के अनुसार, यह पर्याप्त खुलासा भी हो चुका है कि जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला, उस समय के जम्मू और कश्मीर के मुख्य मंत्री ने प्रमुख भूमिका अदा कि थी। हालांकि, क्योंकि पिछले साठ दशक से कांग्रेस ने ज्यादातर हिस्सों पर राज किया, इसलिये कांग्रेस प्रेरित त्रासदी को छुपाना बहुत आसान और सुविधाजनक था।

समय बदलने के साथ एक नई सरकार ने स्थान लिया, एक आशा है, अंतत:, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन के अंतिम अध्याय का खुलासा हो जाय।

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सादगीपूर्ण राजनेता, एक बैरिस्टर और एक शिक्षक थे, वह प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति के मंत्री थे। नेहरू और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बीच हमेशा एक कटुता का भाव रहता था, और दोनों लम्बे समय तक साथ नहीं थे । नेहरू को मुखर्जी के आदर्शों से समस्या थी और उन्होंने कभी भी कतराकर बात नहीं कि जब भी अपनी भावनाओं को बाहर किया । मुखर्जी, भी विरोध और नफरत जैसे वातावरण में रहने के इच्छुक नहीं थे, पार्टी को छोड़ने का निर्णय किया, और 1951 में भारतीय जनसंघ को जन्म दिया । यह बाद में बीजेपी में विकसित हुई।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू और कश्मीर पर जवाहरलाल नेहरू की नीति से कभी सहमत नहीं थे। उन्होंने शेख अब्दुल्ला के दृष्टिकोणों और उनके त्रिराष्ट्रीय सिद्धांत का भी विरोध किया था! यह लगभग भारत विरोधी सलाह थी और मुखर्जी ने इसका विरोध जोर देकर किया।

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 11 मई 1953 को युवा अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कश्मीर की यात्रा कि । नेहरू, अबतक, मुखर्जी से सख्त नफरत करने लगे थे, जिन्होंने गिरफ्तार करवा लिया, जैसे ही उन्होंने जम्मू और कश्मीर की मिट्टी पर पैर रखा। यह स्वाभाविक था कि उन्हें नेहरू के आदेश पर गिरफ्तार किया गया था, जो कथित रूप से मुखर्जी के व्यवहार और स्वतंत्र विचारधारा का बदला लेना चाहते थे । मुखर्जी को सामान्य अपराधी की तरह जेल में रखा गया और गिरने वाले मकान में रखा गया था।

मुखर्जी अस्वस्थ और पीड़ित थे, लेकिन उनकी गिरती स्थिति पर कोई देखभाल नहीं कि गयी । उन्हें कोरोनरी की समस्या थी और उनकी जेल के डेढ़ महीने बाद हॉस्पिटल में देर से भर्ती किया गया। आश्चर्य, उन्हें पेंसिलिन का इंजेक्शन लगाया गया, बिना डॉक्टर को बताये कि उन्हें ड्रग से एल्रर्जी है। किसी ने नहीं सुना, वह उद्देश्य को परास्त कर देता…श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 23 जून 1953 को अपनी आखिरी सांस ली, पीछे छोड़ गये एक रहस्य जो साठ सालों से अधिक समय में खत्म होगा।

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यह विचार-विमर्श है कि यह षड़्यंत्र से अधिक है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माँ ने जवाहरलाल नेहरू से उनकी अनकही मृत्यु पर जांच शुरू कराने के लिये कहा, नेहरू ने इसे नकार दिया, यह कहते हुये कि वह इस मुद्दे को स्वयं देख रहे हैं और कुछ समबंधित लोगों से कहा है। उन्होंने कहा कि वह कोई कत्ल नहीं देख रहे हैं। कैसे एक देश का प्रधानमंत्री ऐसी अपरिपक्व बात कह सकता है? उनका कत्ल एक सम्पूर्ण जांच चाहता है, लेकिन नेहरू तक जनता की निगाहों में स्वयं अभियुक्त थे, उन्होंने सुनिश्चित किया कि इस मुद्दे मे कोई जांच नहीं चाहिये।

जोगमय देवी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पत्नी, ने नेहरू के कारणों को खारिज कर दिया और एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष जांच की मांग की। नेहरू ने उपयोगशून्यता की दृष्टि से देखा और जांच आयोग बैठाने से मना कर दिया। केवल एक गलत आदमी ही खुलासे से डरेगा। नेहरू अपने सक्रिय दिनों में कई उच्चवर्गीय मौतों से जुड़े रहे।

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अटल बिहारी वाजपेयी ने दशकों पहले घोषित किया , 2004 में, कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के पीछे नि:संदेह जवाहरलालनेहरू का हाथ था, यह “नेहरू कॉन्सपिरेसी” में उद्धृत है। दूसरों ने उनकी मौत की जांच न कराने की इच्छा पर सवाल खड़े किये।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अतीत के भूत से पर्दा उठाने के लिये एक सम्पूर्ण जांच ही एक मात्र तरीका है।

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