ताशकंत में ज़हर? क्या रूसी रसोईया भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को खत्म करने के लिये अदा किया गया कारिंदा था?

Posted on by Srishti Jain
 
  

लाल बहादुर शास्त्री, भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता थे, विदेशी भूमि पर एक रहस्यात्मक मृत्यु में मर गये । आजतक, उनकी मृत्यु के दशकों बाद, कोई साफ उत्तर नहीं है। यह कहा जाता है कि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के लिये जिम्मेदार वातावरण को परिवर्तित किया गया था जिससे उन जिम्मेदारियों से सुरक्षा किया जा सके।

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आधुनिक विश्व इतिहास में पहली बार, एक सरकार के प्रमुख की मृत्यु विदेशी भूमि पर हुई।  लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु ज़हर लेने के कारण हुई, प्रधानमंत्री का पद लेने के मात्र दो वर्ष के बाद, भारत को बहुत झकझोर दिया, उसका दर्द आजतक हमारी यादों में ठहरा हुआ है।

कांग्रेस आला कमान ने लाल बहादुर शास्त्री को भारत पाकिस्तान युद्ध को पाकिस्तानी राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के द्वारा समाप्त करने के लिये ताशकंत की यात्रा करने के लिये जोर दिया । उस विनाशक रात में, शास्त्री बिना किसी चेतावनी के मर गये। शास्त्री ने पाकिस्तानी जनरल से एक वादा करने के लिये कहा कि पाकिस्तान भविष्य में सैनिकों का उपयोग नहीं करेगा। हालांकि, शान्ति प्रक्रिया पूरा नहीं हो सकी जैसे लाल बहादुर शास्त्री खामोश हुये।

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 बहुत से इतिहासकार कहते हैं, शास्त्री को उनके रात के खाने मे ज़हरीला खाद्य दिया गया था । उनका आवास एकांत स्थान पर था और शास्त्री के पास मूलभूत सामान- टेलीफोन, घंटी और चिकित्सा सुविधायें भी नहीं थी । क्या इसे ऐसा रूप दिया गया था? उन्हें एकांत में करना और तब मारना, जिससे कोई गवाह न रहे? ठीक रात के खाने के बाद, वह अपने बिस्तर पर गये, कोमा में चले गये और स्वर्ग में निवास के लिये छोड़ गये।

यह कांग्रेस था, शायद, जिसने सुनिश्चित किया कि उनकी मृत्यु के वास्तविक कारणों का पता नहीं चला । उनकी पत्नी ललिता शास्त्री, ने कहा कि उनके पति को ज़हर दिया गया था। उन्होंने कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों से परामर्श के बाद यह दावा किया । शास्त्री को सेवा देने वाले रूसी रसोईये को हिरासत में लिया गया, लेकिन सभी आरोपों से उसे मुक्त कर दिया गया। भारत सरकार ने उनके मृत्यु की तह तक जाने के लिये कोई प्रयास नहीं किया। मीडिया को अंधेरे में रखा गया और बहुत मुश्किल से कोई प्रश्न पूछा गया। वास्तव में , शास्त्री की मृत्यु के बाद पोस्ट मॉर्टम नहीं किया गया था।

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क्या यह शास्त्री को बाहर करने के लिये किसी षड़यंत्र की ओर संकेत नहीं करता है? उनकी मृत्यु पर निश्चित रिपोर्ट जब तक नहीं आयी थी, कहा जाता था कि कोई गलत खेल नहीं हुआ था, वह सिद्धांत रहा होगा।

गलत खेल का यह बहुत घातक प्रमाण है- जब कुलदीप नैयर ने लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु पर सूचना प्राप्त करने के लिये आरटीआई डाला, तो सरकार ने जवाब दिया: ‘पीएमओ को याचिका पर प्रकटीकरण से छूट प्राप्त है यह विदेशी सम्बन्धों को नुकसान, देश में अशांत का कारण और संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन का कारण बन सकता है।’

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क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि एक जिम्मेदार पार्टी के प्रयासों पर पर्दा डाला गया था? अनुमान यह भी लगाया जाता है कि इंदिरा गांधी ने गलत भूमिका निभाई थी। उन्हें शास्त्री जी की मृत्यु से सीधा लाभ मिलता। शास्त्री जी के समीकरण से बाहर करके, इंदिरा गांधी पार्टी के अंदर बिना किसी विरोध और गतिरोध के देश का नेतृत्व करना चाहती थी।

लाल बहादुर शास्त्री आजतक बहुत कम सम्मानित, बहुत अंदेखे प्रधानमंत्री है।