मदर टेरेसा: संत या एक चालाक पापिन

Posted on by Srishti Jain
 
  

वे उन्हें ‘दया की देवी’ कहते हैं। वह दयालु और उदार थीं। वह सड़क पर पड़े कुष्ठ रोगियों को छूने से पहले या मवाद से भरे घाव को साफ करने से पहले दो बार नहीं सोचती थी। वह अपनी विनम्र पृष्ठभूमि के साथ आयी थी, ऐसी अभागी आत्माओं के सर पर छत देने के लिये जिन्हें उनकी स्वयं की त्वचा ने छोड़ दिया था। उन्होंने कभी सोचा नहीं और निस्वार्थ भाव से सभी की सेवा किया, जिससे कि हजारों अन्य लोग उनके रास्ते पर चलने के लिये प्रेरित हों। सभी कहते है कि वह संत होनी चाहिये, जो विश्व के करोड़ों लोगों के दिलों में रहती हैं। जिस किसी की भी सेवा उन्होंने कि, वे सब उन्हें प्यार से ‘मदर’कहते थे, भारत की हमारी मदर टेरेसा। वे कुछ के लिए संत और दूसरों के लिये दुष्ट प्रेरित चालाक धोखेबाज थी।

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मैं निजी रूप से छोटी औरत को प्यार करता था, उनके चेहरे पर पड़ी झुर्रियां उनकी अशांत यात्रा को बताते थे। एक मुस्कराहट जो बिमारी और मायूसी से भरे अस्पताल के अंधेरे कोने को ज्योतिर्मय कर देती थी। मैं उन लोगों से, जो उस रोशनी में उन्हें नहीं देख सकते थे, फुसफुसाते और कभी कभी चीखती आवाज़ों को नोट करने में सहायता नहीं कर सकता था। मैं किसी का मूल्यांकन नहीं कर रहा हूं और मेरा आशय उनका निरादर करना भी नहीं है, जब उनके विरूद्ध शोर बढ़ता है तो कोई सहायता नहीं कर सकता केवल आश्चर्य करता है। क्या वह निस्वार्थ दाता थी या कुछ और जो जरूरतमंदों को उनके नाशवान आत्मा के बदले में सेवा देती थी।

क्या परोपकार वास्तविक था

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कलकत्ता में नीली पट्टियों वाले सिर वाली नन के साथ अन्य कई परोपकारी संस्था हैं, वे विश्व प्रसिद्ध है और उनके पास बहुत सारा धन है। लेकिन कोई स्पष्ट नहीं जानता कितना, इसे रहस्य रखा गया है। मदर टेरेसा की संस्था, भारतीय कानून को चुनौती देता है जो चाहता है कि सभी परोपकारी संस्थायें अपने खातों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करें। यह रहस्य नहीं है कि मदर ने यह स्वीकारा कि लाखों डालर कीटिंग बचत और डुवैलियर परिवार से जानबूझकर छल से प्राप्त किया, लेकिन क्या एक औरत द्वारा ऊपर उठाने और आधारिक सुविधा उपलब्ध कराने का यह भाग्यशाली उपयोग था, जो अभाव के मन्नत के लिये शपथबद्ध थी? उन्होंने खुलेतौर पर प्रसारित किया कि हम कष्ट और अभाव द्वारा ईश्वर के नज़दीक पहुंचते हैं। उनके दर्द को कम करना और उन्हें आरामदायक जीवन देना क्या उन्हें ईश्वर से दूर नहीं कर देगा। अंतत: एक व्यक्ति क्या समझेगा अगर वह देखता था कि बहुत सारा भाग्य दान के रूप में उनके पास आता था और उनकी संस्था आधारिक सुविधा उन लोगों को उपलब्ध कराती थी जिनकी देखभाल उन्होंने किया।

दबाव देकर परिवर्तन और चर्च की महत्ता बताना

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सेवायें असाधारण और गरीब से गरीब तक पहुचायी गयी थी, लेकिन क्या यह बिना किसी प्रेरणा के था? यह तथ्य जानकारी में है कि मदर एक रोमन कैथोलिक धर्मपरायण थी। वह आक्रामकता से ईसाइयत का उपदेश, जिन लोगों की सेवा किया उन्हें, देती थी। वह प्राय: उन्हें मुक्त इच्छा द्वारा बिना पूरी जानकारी दिये बैप्तिज़्म को स्वीकारने के लिए प्रेरित करती थीं। लोगों की ऐसी कई सारी कहानियां हैं जिसमें उन्हें मृत्यु शय्या पर बैप्तिज़्म किया गया। उन्होंने अपनी देखभाल में रहे लोगों को, उनके परिवार से मिलने के लिये छोड़ दिया। क्या यह उन्हें ईसाइयत में विश्वास दिलाकर जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराना था? यह आरोप लगा था कि कई कार्य परोपकार के लिये नहीं किये गये थे और उनके धन का उपयोग मिशनरी के कार्यों के लिये किया गया था। उनके समय के दौरान बहुत सारे लोगों का कहना है कि बड़ी सहयोग राशियां कैथोलिक चर्च को दी गयी थी। अगर यह दासता सच में निस्वार्थ थी तब क्यों वह मरते और मायूस आत्माओं को जीतना चाहती थीं?

अमीरों और प्रसिद्ध लोगों से सम्बंध

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यह विदित तथ्य है कि पवित्र माता के चाहने वाले विश्व भर में फैले धनी और प्रसिद्ध थे। उनका घनिष्ठ सम्बंध दक्षिण-पंथी तानाशाह जीन-क्लाउड डुवैलियर के साथ था, जिन्होंने, अपने निर्वासन के बाद, तात्कालिक हैती से लाखों डॉलर को चुराकर पाया था। उन्होंने खुलेतौर पर उनका समर्थन किया था और उन्हें दयालु व्यक्ति के रूप में चित्रित किया था, जो गरीबों को प्यार करता था। उन्होंने आक्रामकता से अल्बानिया में एन्वर होक्सिआ के नास्तिक काल का समर्थन किया था। उन्होंने ब्रिटिश प्रकाशक रॉबर्ट मैक्सवेल से धन स्वीकार किया, जिन्होंने, बाद में खुलासा हुआ था, अपने कर्मचारिओं के पेंशन कोष से 450 मिलियन ब्रिटिश पाउंड का गबन किया था। चार्ल्स कीटिंग ने मदर टेरेसा को लाखों डॉलर दान किया था और जब वह अमेरीका गयीं तो उन्होंने अपना निजी जेट दिया था। उन्होंने धन वापस करने से मना कर दिया था और बार बार कीटिंग की प्रशंसा किया। उन्होंने इटली में कई हत्याओं और उच्च वर्गीय भ्रष्टाचार मुकदमों के आरोपी लिसिओ गेल्ली का समर्थन किया। क्रिस्टोफर हिट्चेंस उनके प्रख्यात आलोचक थे।

बचतों का संचय किया जबकि गरीब प्रभावित थे

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एक पुराने परोपकारी घर के पोलिश मिशनरी ने निरीक्षण किया कि वास्तविकता में दान का क्या हुआ, तब उन्हें बेघरों की शरणस्थली के तहखाने में बहुत महंगी किताबें, आभूषण और सोना भरा पड़ा मिला था। सिस्टरों ने मुस्कुराते हुये प्राप्त किया था और उन्हें रखा था। इनमें से ज्यादातर हमेशा से बिना उपयोग के पड़े थे। लाखों जो इस तरह से दान की तरह मिले थे उनका भी भाग्य यही था। इनका उपयोग न करना भी एक प्रकार दुरूपयोग नहीं है? पुरानी सिस्टर के खातों में इस प्रकार के दान का एक तरफा रास्ता था और ईश्वर के प्रेम का मापक है। क्या लेना, देने से ज्यादा पवित्र है। दुर्भाग्य से जिन लोगों के लिये इस दान का इरादा था वे लोग सबसे अधिक पीड़ित रहे। पर्याप्त और स्वास्थ्यवर्धक चिकित्सा सुविधा के अभाव के कारण बहुत से बीमार लोग पीड़ित रहे और सड़ गये। जो कुछ प्राप्त किया गया वह विश्व भर से उनके पास आने वाला लाखों था। मदर टेरेसा का केंद्रीय दर्शन बचत था, लेकिन जल्द ही उनका गरीब संगठन अमीर हो गया, एक व्यक्ति आश्चर्य करता है कि उनके आभूषण,  दायागत घर, चेक और सूटकेस दौलत से कैसे भर गये। अगर वह चाहतीं तो वह लोगों की सेवा, पागलों की तरह बचत करने से नहीं बल्कि बजाय इसके लोगों को ज्यादा खर्च के विचार से, कर सकती थीं। एक स्थायी परोपकारी तंत्र के लिये, अच्छा होता कि नन को नर्स, टीचर या मैनेजर बनने के लिये प्रशिक्षण दिया जाता। लेकिन मिशनरी की परोपकारी नन को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया।

गर्भपात अशुभ है और तलाक एक अपराध

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क्या गुलामी किसी महिला के चुनाव के अधिकार को नियंत्रित करती है? क्या एक बालात्कार की गयी महिला को दोषी ठहराना बेकार बात नहीं है, भारत-पाक युद्ध के दौरान बहुत सारी पीड़ित महिलाओं ने गर्भपात को चुना था। एक मरती और पीड़ित महिला ने कहा कि गर्भपात, सबसे खराब कृत्य और शान्ति का सबसे बड़ा दुश्मन, को चुनने के बजाय मौत को चुनना बेहतर था। वह कहती थी कि यह एक महिला द्वारा अपने ही बच्चे के लिये चुना हुआ कत्ल है। एक ऐसे विश्व में जिसमें हमारी महिलाओं के सशक्तिकरण के रास्ते और माध्यम ढ़ूढ़े जाते है, उन्होंने पीड़ित महिलाओं को रखने का सुझाव दिया और उनके अपने शरीर के नियंत्रण में नहीं। उनके मंत्रालय द्वारा तलाक को भी कम किया गया। करो या मरो, लेकिन तलाक नहीं।

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मदर टेरेसा का दर्शन था: अच्छे अंत:करण के लिये धन। गरीब पीड़ित रहे जबकि दानियों को लाभ मिला। क्या वह वास्तविकता में पीड़ितों को हटाना या गरीबी से लड़ना चाहती थी। गरीब होकर, पीड़ित होना, उनके लिये लगभग एक आकांक्षा या एक उपलब्धि का लक्ष्य था और उन्होंने इस लक्ष्य को सभी के ऊपर आरोपित किया जो उनके सम्पर्क में आया; उनकी यह वास्तविक आज्ञा मरणोपरांत थी। समय के साथ वह अपने इस आदेश से बनने वाली अपनी छवि के साथ सचेत हुई। उन्होंने मदर के घर के बाहर एक बोर्ड लगाकर लिखा “उन्हें बता दो हम यहाँ काम के लिये नहीं है, हम यहाँ पर जीसस के लिये हैं। हम उन सभी के ऊपर धार्मिक है। हम सामाजिक कार्यकर्ता  नहीं है, शिक्षक नहीं है, डॉक्टर नहीं हैं, हम नन है”। मेरा प्रश्न है, किस लिये, इस स्थिति में, ननों को इतना धन चाहिये था? और क्यों नहीं यह उनके प्यारे ‘गरीब से गरीब’ की देखभाल और सुविधाओं में दिखायी देता है।