पचास के दशक में जवाहरलाल नेहरू ने यूएन में स्थायी सदस्यता के लिये अमेरिकी प्रस्ताव को नकार दिया था। उन्होंने कहा चीन पहले!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

“यह भारत का अधिकार है कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता को प्राप्त करे”, हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गरजे, पेरिस में भारतीय प्रवासियों को सम्बोधित करते हुये। इतने कम समय में किसी भी अन्य पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री की तुलना में, अब तक मोदी ने आधिकारिक हैसियत से 20 से अधिक देशों की यात्रा किया। हम लगभग उत्तीर्ण अंक तक पहुंच चुके हैं, लेकिन स्थायी सुरक्षा परिषद में आधिकारिक सदस्यता प्राप्त करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं!

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संयुक्त राष्ट्र संघ, अपने वर्तमान स्वरूप में, समकालीन विश्व की वास्तविक्ता को प्रतिध्वनित नहीं करता है। गतिशीलता आज भिन्न है जो गत वर्षों में प्रचलित था। यूएसएसआर, उदाहरण के लिये, अपने आप तबाह हो गया, विभिन्न राज्यों में टूट गया, अपनी ताकत और वैश्विक मामलों में महत्वपूर्णता को खो दिया। इस बीच, चीन अपनी ताकत को लगातार बढ़ा चुका है। भारत ने भी किया है, लेकिन अपने आप के लिये स्थायी सुरक्षा परिषद में जगह बनाने में कठिनाई को पाता है। वीटो के कारण रास्ते बंद है, चीन भारत को इस धरती पर पांच महाशक्तियों के साथ बैठा देखने के विचार से सहज नहीं है।

भारत अब से महज दो सालों में, नरेंद्र मोदी के दक्ष नेतृत्व में विश्व की सबसे तेजी से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के लिये तैयार है। वैश्विक आर्थिक दृश्य में अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष द्वारा सबसे अद्यतन अनुमान है। वस्तुत:, विश्व बैंक ने पिछले सप्ताह अनुमानित किया कि भारत 2017 तक चीन को सफलतापूर्वक विस्थापित कर देगा।

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फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी सदस्य, ने पहले ही घोषित कर दिया है कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के विस्तार के पक्ष में है, इसलिये भारत को को शामिल किया जा सकता है।

लेकिन क्या यह हो पायेगा? क्या हमें दूसरों की मर्जी और कल्पनाओं पर निर्भर रहना होगा?

अगर आपने इतिहास का सूक्ष्मता से अध्य्यन नहीं किया है, तो आप नहीं जान पायेंगे कि हमें यूएन में स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, पंडित जवाहरलाल नेहरू, का उनका अपना दिमाग था। आज तक, नेहरू के गलत निर्णय का भुगतान हम कर रहे हैं!

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60 साल पहले, संयुक्त राज्य, तब के लगभग निर्विवाद महाशक्ति, ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये प्रस्ताव दिया था। अमेरिका चीन के स्थान पर भारत को चाहता था लेकिन लेकिन नेहरू ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इतिहासकारों के चयनित काम नेहरू को उद्धरित करते है जैसा कि सोवियत प्रधानमंत्री, मार्शल निकोलाई ए. बुल्गानिन, ने 1955 में, अमेरिकी प्रस्ताव पर कहा, “मैं महसूस करता हूं कि हमें चीन को स्वीकार करने पर पहले ध्यान देना चाहिये।”

चीनियों को खुश करने के लिये, नेहरू ने कायरता के मानक को अपनाया, भारत के अपने लम्बी अवधी के हितों को अंदेखा किया। उनमें भारत के हितों को अन्य देशों की तुलना में आगे रखने के लिये दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता का अभाव था। अमेरिका में प्रभावित करने की शक्ति थी और आज, भारत स्थायी सदस्य हो सकता था बिना वैश्विक पटल पर विनती किये हुये।

देखें क्या हुआ आगे!

भारत-चीन युद्ध!

1962 के भारत-चीन में हुये अपमान और लज्जा को हर भारतीय याद करता है!

नेहरू, इस तथ्य से इंकार करते हैं कि भारत चीन की दूसरी जालसाज़ी का शिकार होगा, चीन के साथ सम्बंध बनाने के इच्छुक थे और 29 अप्रैल 1954 को चीन के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया- ‘पंचशील का सिद्धांत’, तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार किया था। नेहरू, सम्बंध को मुहरबंद करने के लिये व्यग्र थे, ने लगातार तिब्बत की स्थिति को अंदेखा किया।

जब जवाहलाल नेहरू, सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिये, चीन के आगे नतमस्तक थे, चीन अक्साई चीन को प्राप्त करने के लिये बड़ी योजनायें बना रहा था!

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यहां तक कि रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन और वल्लभ भाई पटेल के लगातार कहने पर, चीन के छुपे मनसूबों की ओर इशारा करते रहे, नेहरू अविचलित रहे। उनका ‘भारत-चीनी मित्रता’ का अंधा विश्वास भारतीय सेना को निराश्रित, नि:शस्त्र और अनुपयुक्त छोड़ दिया!

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जवाहरलाल नेहरू ने, उन लोगों को बुलाया जो भारत-विरोधी थे, संसद में असभ्य व्यवहार करने वालों को सलाह दिया कि, “अक्साई चीन में घास का एक तिनका भी नहीं उग सकता है; भारतीय क्षेत्र का नुकसान बहुत कम है।” एक साथी सांसद, महावीर त्यागी ने नेहरू के गंजे सिर की ओर इशारा करते हुये कहा, “यहां भी कुछ नहीं उगता। इसे भी काट देना चाहिये या किसी और को दे देना चाहिये?” यह प्रत्युत्तर था जिस पर नेहरू का चेहरा लाल हो गया।

अब और तब चीन नियंत्रण रेखा पर उल्लंघन कर रहा है और अरुणाचल प्रदेश पर अधिकार जताता है जैसा कि तिब्बत के दक्षिणी हिस्से पर है। नेहरू की एक गलती के कारण भारत को अब तक बहुत नुकसान उठाना पड़ रहा है!

कश्मीर में रक्तपात (चीन ने गुप्त भूमिका निभाई)

नेहरू ने फिर गलत घोड़े को चुना। फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने उल्लेखों में कहा कि नेहरू कश्मीर पर पूरी तरह अनिश्चित थे और यह पटेल का दबाव था कि भारत ने निश्चित कार्यवाही किया और घाटी को पाकिस्तान के आगे बढ़ने से बचा लिया।

नेहरू, एक अच्छे दिन, ऑल इंडिया रेडियो पर घोषणा किया कि वह मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठायेंगे, और भारत या पाकिस्तान से जोड़ने  या स्वतन्त्र रहने का निर्णय करायेंगे, यह कश्मीर के लोगों के बीच जनमतसंग्रह के द्वारा होगा। तब से आज तक, यह नुकसानदायक बिंदु  विवादों में घिर गया है और समय समय पर अलगाववादियों द्वारा जनमतसंग्रह की मांग उठायी जा रही है।

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जल्द ही, बजाय बाद के, हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य होंगे। लेकिन इस पर हुये समय और प्रयास की बर्बादी का ज्यादा अच्छा प्रयोग हो सकता है अगर जवाहरलाल नेहरू ने पहले अपनी मातृभूमि की ओर के कर्तव्य को निभाया होता।

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