अब सबकुछ शांत हो गया है! पाकिस्तान के सबसे अधिक सम्मानित इतिहासकार अकबर जैदी, ने कहा, वे 1965 के युद्ध में बुरी तरह हारे थे!

Posted on by Srishti Jain
 
  

अब से कुछ समय पहले तक दो धुर- विरोधी राष्ट्रों भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे गर्म बहस और चर्चा का विषय 1965 का युद्ध हुआ करता था।

इसमें कौन वास्तविकता में जीता?

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पाकिस्तानी इतिहासकार और राजनैतिक अर्थशास्त्री, अकबर जैदी, बनाकर नहीं बोलते है, जब वह दावा करता है कि पाकिस्तान, भारत के साथ “1965 के युद्ध में बुरी तरह हारा था”!

डॉन में प्रकाशित, अकबर जैदी के युद्ध पर इस मत पर पाकिस्तान व्यवस्थापकों में लहरों के पंख को फैला दिया था। पाकिस्तान के “विजय मिथक” को तितर बितर करते हुए, भयमुक्त इतिहासकार ने कहा: “ पाकिस्तान की जनता इस तथ्य से अनभिज्ञ है क्योंकि पाकिस्तान की कक्षाओं में जो इतिहास पढ़ाया जाता है वह एक आदर्शात्मक दृष्टिकोण है।

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श्रीमान जैदी ने अपना यह दृष्टिकोण एक व्याख्यान, जिसका शीर्षक, “पाकिस्तान इतिहास पर पूछताछ”, में साझा किया वह कराची में व्यवसाय प्रबंधन संस्थान में इतिहास पढ़ाते हैं।

अकबर जैदी ने अपने छात्रों को राजनैतिक और कूट्नैतिक विश्लेषक, शुज़ा नवाज की पुस्तक- “क्रॉस्ड स्वोर्ड्स- पढने की सलाह दी, जो युद्ध के परिणामस्वरूप आने वाली सच्ची परिस्थित पर प्रकाश डालता है।

उनका यह कथन 6 सितम्बर को पाकिस्तानी रक्षा दिवस से ठीक दो दिन पहले आया, जब देश ने 1965 युद्ध की पचासवीं वर्षगांठ को प्राप्त किया।

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श्रीमान जैदी ने अपने श्रोताओं से पूछा: “पाकिस्तान का इतिहास क्या है, और क्या पाकिस्तान के इतिहास पर प्रश्न पूछने की जरूरत है? और पाकिस्तान कब बना? 14 अगस्त 1947, या 15 अगस्त 1947 को?

पाकिस्तान कब बनाया गया था पर, इतिहासकारों का सीधा उत्तर 14 अगस्त 1947 है। हालांकि, उन्होंने पाकिस्तान अध्ययन की पुस्तक से एक उद्धरण को पढ़ा, जिसमें यह दावा किया गया था कि पाकिस्तान 712 ई0पू0 में अस्तित्व में आया जब अरब, सिंध और मुल्तान में आये। “यह बहुत बकवास है!” उन्होंने प्र्त्युत्तर किया और जोड़ा: “पाकिस्तान में इतिहास को भौगोलिक इकाई के रूप में देखा जाना चाहिये” ।

भिन्न परिचय पर, उन्होंने कहा कि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी। “मैं एक समय में सिंधी, हिंदू और पाकिस्तानी एक साथ हो सकता हूं”।

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1965 का युद्ध कश्मीर के क्षेत्र पर नियंत्रण के लिये लड़ा गया था। सीमा के दोनों ओर से हजारों जानों को खोया गया था।

सन्युक्त राज्य और सोवियत संघ ने मध्यस्ता का अनुभव किया क्योंकि युद्ध नियंत्रण से बाहर जाना शुरू हो चुका था। दोनों महाशक्तियों ने धुर-विरोधियों पर दबाव डाला और इन्हें युद्ध विराम की सहमति के लिये दबाव दिया। इसने जनवरी 1966 में शांति का मार्ग प्रशस्त किया, जिसे ताशकंत समझौते के रूप में जाना जाता है।

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अंत में, हालांकि, अतीत में खोज बिनोज में क्या अर्थ है? इससे कैसा मतलब है कौन जीता? आधी शताब्दी बीत चुकी है, पीढियां आयीं और चली गयी। आज विकास पर ध्यान देना है, युद्ध पर नहीं।

अगर यह शुद्ध रूप से डींगें मारने के लिये है, तब हम बच्चों जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

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