ईश्वरीय कार्य, संजय गांधी की मौत इंदिरा गांधी की गुप्त योजना तो नहीं है?

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

लगभग 35 साल बीत चुके है, इंदिरा गांधी के युवा वंशज संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हुये, लेकिन इस त्रासदी के बारे में अनुमान और सिद्धांत खत्म होने का नाम नहीं ले रहें हैं। 23 जून 1980 को, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का 33 वर्षीय नाती अपनी मृत्यु को प्राप्त हुआ जब उसके द्वारा उड़ाया जाने वाला हवाई जहाज दिल्ली में सीधे जमीन पर आ गिरा।

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23 जून 1980 को, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का 33 वर्षीय नाती अपनी मृत्यु को प्राप्त हुआ जब उसके द्वारा उड़ाया जाने वाला हवाई जहाज दिल्ली में सीधे जमीन पर आ गिरा।

1974 में संजय और मेनका की शादी होने के ठीक एक साल बाद, भारत ने बहुत बड़ा राजनैतिक उठा पटक देखा, और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी शक्ति की कुर्सी को बचाने के लिये राष्ट्रीय आपात की घोषणा किया।इस अवधि के दौरान, संजय जो अपनी मां के बहुत करीब थे, वह उनके राजनैतिक सलाहकार की भूमिका निभाने लगे। और लौह नसों के लिये जानी जाने वाली उस महिला ने, राष्ट्र की हुकूमत करने वाले अपने प्यारे पुत्र की प्रशंसा करना शुरू कर दिया।

इन सब के बीच, बड़ा पुत्र राजीव और उनका परिवार राजनैतिक सरगर्मियों से दूर खुशी से जीवन यापन कर रहा था। जब वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट के रूप में उड़ान पर रहते थे, तब उनकी पत्नी सोनिया प्रधानमंत्री के घर सफदरजंग 1, पर घरेलू प्रबंधन में अपना समय बिताती थी और अपने दोनों बच्चों, राहुल और प्रियंका को बड़ा करने में व्यस्त रहती थीं। सोनिया ने एक बहू के रूप में खुश करने के लिये वह सबकुछ किया जो उनकी सास के लिये आदर्श था। इंदिरा गांधी ने भी भारतीय बहू मेनका के बजाय अपनी विदेशी बहू का स्पष्ट समर्थन किया।

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संजय गांधी अपने नज़दीकी मित्रों कमल नाथ और जगदीश टाइटलर के साथ जिन्हें, उन्होंने राजनीति में धकेला था

इन दो बहुओं के बीच की प्रतिद्वंदिता बहुत अधिक चर्चित है। लेखक पत्रकार खुशवंत सिंह, जो मेनका के परिवार के ज्यादा नज़दीकी सदस्य थे, अपने वृतांत में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने मेनका को अपना राजनैतिक सचिव नियुक्त करने का निर्णय लिया था। लेकिन तब सोनिया ने मामले में हस्तक्षेप किया और प्रधानमंत्री को इस कदम के विरुद्ध फुसलाया था। एक के बाद दूसरे कार्यों, और संजय की मृत्यु के बाद उनकी विधवा मेनका और पुत्र फिरोज़ वरूण को पूरी मीडिया के सामने प्रधानमंत्री आवास से बाहर निकाल दिया गया था। मैं विश्वास करता हूं कि यह मामला कल्पना करने वालों के लिये हो सकता है जो यह विश्वास करते हैं कि यह वही मां है जिसका हाथ अपने पुत्र की मौत के पीछे है।

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इंदिरा गांधी के ऐसे कई उदाहरण दिये हैं जिसमें उन्होंने अपनी विदेशी बहू का पक्ष लिया बजाय भारतीय बहू मेनका के

यह मुझमें एक कौतूहल उत्पन्न करता है कि सोनिया ने, जो राजनीति में कभी कोई रूचि नहीं दिखाने के लिये जानी जाती है, मेनका को नियुक्त करने से अपनी सास को रोकने का प्रयास क्यूं किया। यह बाहर आया है कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा के पहले इस मामले को रूस के साथ चर्चा किया था। रूस इस बात को जानता था कि संजय गांधी का दबाव अपनी मां के राजनैतिक निर्णयों के पीछे था और यह भी सम्भव हो सकता है कि रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी ने संजय को मारने के लिये हवाई जहाज दुर्घटना की गुप्त योजना बनाई हो।

लेकिन तब सवाल यह खड़ा होता है कि ऐसा करने से रूस को क्या फायदा होगा, जबकि भारत में ही संजय के पास दुश्मनों की झुंड थी? अगर हम इंटरनेट पर पायी जाने वाली गुप्त सूची से हटे भारतीय खुफिया रिपोर्टों की ओर देखें, तो हम इस धुंध में उभरते चित्र को देख सकेंगे। वहाँ पर एक “रूसी अवधारणा” है जिसे उस समय की भारतीय खुफिया द्वारा समर्थन दिया गया था, जो शक की सुई को ईश्वरीय कार्य, वैटिकन की शीर्ष रहस्यमयी खुफिया सेवा, की ओर घुमा देता है। कथित रिपोर्टे कहती है कि ईश्वरीय कार्य और रूसी खुफिया कुछ मामलों पर एक साथ थीं और देश ने इस खुफिया को संजय को खत्म करने का कार्य दिया था।

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रूस इस बात को जानता था कि संजय गांधी का दबाव प्रधानमंत्री मां के राजनैतिक निर्णयों के पीछे था

इसलिये केजीबी ने संजय की हवाई दुर्घटना करवाया था और प्रधानमंत्री के बड़े पुत्र का रास्ता साफ किया था। हो सकता है कि यह सिद्धांत वास्तविकता से बहुत दूर हो, लेकिन यह पूरी तरह से असम्भव भी नहीं है कि राजीव की रोमन कैथोलिक पत्नी, जिसके परिवार का सम्बंध वैटिकन के साथ प्राचीन समय से था, ने संजय की मौत से फायदा उठाया।

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