हाजी मस्तान, सत्तर के दशक में अपराधजगत के असली मुखिया, ने तस्करी की कला दाउद इब्राहिम को सिखायी। वह हत्या के विरूद्ध था।

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

हम अपराधजगत को कई डर के साथ देखते हैं। मौत का डर, वसूली का डर, अपहरण, अपंग बनाना आदि। हम इस दुनिया के सरगनाओं के बारे पढ़कर ठीक रहते हैं, टीवी पर उनके बारे में सुनना, गिरोह युद्ध, गली के झगड़े को सुनना आकर्षक लगता है। यह बुद्धिमानी नहीं होगी कि हम उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करें और न ही अच्छा होगा कि हम गलत तरीका अपनायें! अपनी दूरी बनाये रखना, मेरी सलाह होगी।

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हाजी मस्तान, यद्यपि, एक अलग समय से एक अलग कहानी है। वह एक गैंग्स्टर था जिसने तस्करी के द्वारा अपने करोड़ों बनाये, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी का कत्ल नहीं किया। उसने जीवन को मूल्य दिया, तस्करी जैसे साधारण काम के लिये इसे बर्बाद नहीं करना चाहिये। वह एक ‘नैतिक डॉन’ से बढ़कर था, नैतिक सिद्धांतों के साथ जिसने सत्तर के दशक में दुबई से भारत और अन्य हिस्सों में उसके सोने के तस्करी के व्यापार को नियंत्रित किया।

सुल्तान मिर्जा के नाम से प्रसिद्ध, हाजी मस्तान अपराधजगत का निर्विवाद डॉन था। वह स्वाभाविक रूप से सामाजिक कार्यकर्ता था, मुम्बई के साथ गहरा लगाव था। उसके धर्मार्थ कार्यों को आज भी मुम्बई की गरीब क्षेत्रों में पाया जाता है, जहाँ हाजी मस्तान ने दया की छाप छोड़ी है।

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आज के गैंगस्टर- दाउद इब्राहिम, छोटा राजन, छोटा शकील, अरूण गौली- सभी हाजी मस्तान के द्वारा प्रशिक्षित किये गये हैं। उन्होंने इन सभी के लिये नींव रखी, लेकिन उन्होंने कभी कल्पना नहीं की होगी कि उनके शिष्य राक्षस में बदल जायेंगे। उन्होंने इन सभी को अंतर्राष्ट्रीय तस्करी के महत्वपूर्ण पहलू बताये, एक कला जिसमें वह मास्टर थे। तस्करी के साधारण तरीकों को उन्होंने विचार-विमर्श के अभ्यासों द्वारा उनके दिमाग को तेज़ किया। उन्होंने ड्रग्स,बंदूक या किसी अन्य माध्यम के द्वारा मानव जीवन को समाप्त करने से दूर रहने के लिये भी कहा।

सैकड़ों मौतों के लिये जिम्मेदार, सामूहिक रूप से, वे अपने वर्ग के म्युटेंट (उत्परिवर्तित) थे। दाउद इब्राहिम, छोटा राजन और छोटा शकील ने अपना साम्राज्य मौत के डर से बनाया। वास्तविक हत्यायें उनके सहयोगियों ने किये।

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दाउद इब्राहिम के पिता एक पुलिस स्टेशन पर पीएसआई थे और हाजी मस्तान को जेल से भागने में कई बार मदद किया था। उन्होंने ऐसा किया क्योंकि वह मानते थे हाजी एक उदार और दयालु आत्मा थे। जेल में प्राप्त अनुभवों की सहायता से वह ज्यादा धार्मिक व्यक्ति में परिवर्तित हो गये। उन्होंने जेल में हिंदी सीखी और जल्दी से समाज के लिये अपने कार्य शुरू कर दिया। वह एक सुधरे आदमी थे और कई सुधार-उन्मुख युवाओं के संरक्षक थे।

हाजी मस्तान मुम्बई के पहले हस्ती-सरगना थे, वास्तविक आदर्श! वह एक सफल वितरक थे और सिनेमा व्यवसाय में गहरा प्रभाव बनाया था। जैसे जैसे समय के साथ उनका प्रभाव बॉलीवुड में बढ़ता गया, उन्होंने खुद ही फिल्मों का उत्पादन शुरू किया। यहाँ तक कि उन्होंने फिल्मों में प्रारम्भिक प्रयत्न की योजना बनाई, मेरे गरीब नवाज़ शीर्षक के प्रोजेक्ट के साथ, बाद में अन्य और चलचित्रों के साथ। उनका राजकपूर, दिलिप कुमार, शशी कपूर, संजीव कुमार और कई अन्य के साथ अच्छा सम्बंध था। परवीन बॉबी और हेलेन की सहायता के लिये फिल्म उद्योग में पुन: वापसी के लिये हाजी मस्तान एक साधन थे। अमिताभ बच्चन, सलीम खान, धर्मेंद्र और लगभग सभी चर्चित हस्तियों ने उनके अनुभव और बुद्धिमत्ता का उपयोग अपनी समस्याओं को सुलझाने में किया। हाजी मस्तान सहायता के लिये हमेशा खुश रहते थे। कुछ बॉलीवुड मूवी उनके द्वारा प्रभावित भी हैं जैसे दीवार अमितभ बच्चन अभिनीत और वंस अपॉन अ टाइम सजय देवगन अभिनीत।

हाजी मस्तान बॉलीवुड अभिनेत्री सोना के प्यार में पागलों की तरह दीवाने थे और उनसे शादी किया। वह उनसे बहुत प्यार करते थे जिसके कारण उन्होंने उनके लिये कुछ मूवियों को पैसा भी दिया और उन्हें एक बंगला जुहू में, देवानंद के घर पास स्थित, उपहार में दिया।

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तस्करी को पीछे छोड़ने के बाद हाजी मस्तान राजनीति में उतरे और ‘लघुमति मुस्लिम दल’ बनाया। उनके पास उच्च वर्गीय स्थान पेद्दार सड़क, सोफिया कॉलेज के सामने बहुत बड़ा मकान था। सोने, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की तस्करी से पाये करोड़ों के बजाय, उन्होंने छोड़ दिया, अपनी राजनैतिक पार्टी को चलाया और गरीबों के साथ समय समय पर मिलने में समय व्यतीत किया। उन्होंने एंटी ड्रग कार्यकर्ता डॉ0 यूसुफ मर्चेंट के साथ हाथ मिलाया  और युवकों को मृत्युकारी ड्रग से दूर रहने के लिये कहा।

उन्होंने हाजी मस्तान जैसे डॉन को और नहीं बनाया। हाजी मस्तान कैंसर के कारण 9 मई 1994 को मर गये।