गांधी, एक षड़यंत्रकारी वकील, ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिये ब्रिटिशों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया

Posted on by Alisha Bhatt
 
  

स्टैफ्फोर्ड क्रिप्स, एक ब्रिटिश लेबर राजनीतिज्ञ ने टिप्पणी किया है: “गांधी एक साधारण रहस्य नहीं थे; वह अपने धार्मिक दृष्टिकोण और वकील प्रशिक्षण प्राप्त मस्तिष्क के साथ विवेक बुद्धि में तेज और कुशल थे। वह वाद विवाद में सामने वाले के साहस को तोड़ने वालों में से थे।

आज की पीढ़ी के लिये, महात्मा गांधी का सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन, अपने अधिकारों की लड़ाई के लिये “निष्क्रिय-सक्रियता” के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

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गांधी का प्रहार उनके सामाजिक राजनैतिक स्वतंत्रता आंदोलन की असफलता के रूप में हैं, इस दावे के साथ कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आक्रामक तेवरों से ब्रिटिश भयभीत हो गये थे। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सरकार के साथ एक वकील थे और भारत में आने से पहले उन्होंने अपने व्यवसाय की निंदा की थी और सक्रिय रूप में एक सामाजिक कार्यकर्ता के साथ राजनैतिक शख्सियत के रूप में अपनी छवि बनायी।

महात्मा गांधीं, विश्व के प्यारे “महात्मा”, अपने आपको भारत में निष्क्रिय सुधारक में बदलने से पहले 25 सालों तक एक वकील के रूप में कार्य किया था। रोचक रुप में, वह एक नागरिक अवज्ञा करते थे जबकि वह खुद एक वकील थे। अनभुव जिसे उन्होंने अपने वकील के रूप में दक्षिण अफ्रीकियों और ब्रिटिश सरकार के साथ अपनी लड़ाई के दौरान प्राप्त किया था, वह भारत के लिये राजनैतिक, आर्थिक और समाजिक न्याय की रक्षा करने के लिये आधार का काम किया।

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महात्मा गांधी के तर्क तथ्यों से समर्थित थे, जिसे उन्होंने “सत्य” के आवश्यक अंग के रुप में स्वीकार किया। और इसे उन्होंने वाद-विवाद में जीत हासिल करने के लिये और अपने आदर्शों से जनसामान्य का नेतृत्व किया। ब्रिटिश शासित दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों का बचाव करते हुये, महात्मा गांधी ने तर्क दिया, “हम साम्राज्य के अंग हैं। आपको हमारे विरुद्ध भेदभाव का व्यवहार नहीं करना चाहिये। हम इन काले लोगों की तरह नहीं हैं…….हम इन सबसे अलग हैं। और आपको हमारे साथ उनके जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिये।“

यह किसी की सोच से परे है कि महात्मा ऐसी कोई बात भी कह सकते हैं, जो हमेशा से समानता की बात करता रहा हो। लेकिन उन्होंने किया; क्योंकि उनमें एक राष्ट्रीयता का आकर्षण था, और शासकों के साथ भारतीयों के अच्छे व्यवहार के लिये दिमागी खेल को खेला।

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जब गांधी भारत वापस आये, तब उन्होंने एक बहुत रहस्यपूर्ण दिमागी खेल को अपनाया: ब्रिटिशों के हाथ में शिकार का खेल। वह अपने भाषणों में कमजोर, असक्रिय और    याचना कर रहे थे, जबकि वह एक चालाकी भरी वाक्पटुता थी जिससे स्वतंत्रता के लिये हजारों भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने और जोड़ने के लिये अपना बुलावा दिया।

1920 तक, उनके सत्याग्रह के विचार ने महात्मा गांधी को एक बहुत ही प्रभावशाली शख्सियत बना दिया। इतिहास एक आश्चर्यजनक राजनैतिक परिवेश का साक्षी बना: एक निष्क्रिय कदम में सक्रिय सहभागिता। राज द्वारा प्रयोग किया गया किया निर्दयी तरीका जिससे कि आंदोलन को दबाया जा सके काम नहीं कर रहा था; ब्रिटिश इस विरोधाभासी परिस्थिति में चकरा गये थे; वे लोगों का सामना कैसे करें, जो उनका सहयोग नहीं कर रहे थे, लेकिन जब गिरफ्तार और मारे जाते थे तो कोई विरोध भी नहीं दिखाते थे!

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महात्मा गांधी ने खादी के लिये आंदोलन चलाया जिससे कि भारतीय गावों में रहने वाले गरीब लोगों के लिये एक राहत हो। जैसे जैसे स्वतंत्रता संघर्ष गति पकड़ता गया, खादी को बुनना एक राष्ट्रीय प्रतीक बनता गया। यह एक तरीका था ब्रिटिशों को यह बतलाने का कि भारतीय आधारिक आवश्यकताओं के लिये साम्राज्यिक नीतियों के ऊपर निर्भर नहीं रहेंगे।

महात्मा गांधी द्वारा चलाया गया सविनय अवज्ञा आन्दोलन विरोध करने का एक सक्रिय तरीका था, विशेषरुप से एक सम्राज्य के विरुद्ध  जिसने कि लगभग सम्पूर्ण विश्व पर अपना आधिपत्य प्राप्त किया था। गांधी द्वारा भारत में शुरू किये गये सविनय अवज्ञा आंदोलन से बहुत पहले वह सत्याग्रह आन्दोलन के लिये प्रसिद्ध थे जिसे उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में चलाया था। उनके समर्थकों की संख्या बहुत अधिक थी, वह मानी जानी वाली एक शख्सियत थे, और निश्चित रूप से विश्व के लाखों लोग उनके बारे में जानते थे।

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महात्मा गांधी ने ब्रिटिशों को प्रताड़ित करने के लिये हर तरह के उपायों को अपनाया जैसे: सत्याग्रह, धरना, घेराव, उपवास और बंद। जब गांधी को दंगा फैलाने के लिये आरोपित किया गया था, तब उन्होंने बात करने की कुशलता के साथ कहा कि भारतीयों को उनके अधिकारों और अस्तित्व से दूर रखा गया था, और इस समस्या का उपाय असहयोग आंदोलन से ही पाया जा सकता है। उनके देशवासी अहिंसा के साथ स्वराज की मांग कर सकते थे, और गरीबी के अंधकार युग में उन्हें धकेल दिया। भारतीय उस समय बहुत गरीब थे जिसके कारण वे बंदूकों और हथियारों को नहीं खरीद सकते थे जो उन्हें निर्दयी प्रशासन से लड़ने में मजबूती प्रदान करता। उन्होंने साम्राज्य के ऊपर देशवासियों को आतंक और संगठित ताकत का प्रदर्शन करके वश में करने का आरोप भी लगाया।

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गांधी ने ब्रिटिशों को उनका चेहरा आइने में दिखाने का साहस किया। उन्होंने साफ साफ अधिकारियों को बतला दिया था कि कैसे वे कपटी थे और अपने भ्रम के विश्व में रह रहे थे। उन्होंने विरोध के उपाय के रूप में भूख हड़ताल को अंतिम समाधान के रूप में चुना, इस बात को जानते हुये कि ब्रिटिश सरकार अपने प्यारे बापू के लिये जनता के दबाव को झेल नहीं पायेगी।

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यह विश्व के मनोविज्ञान के ऊपर का खेल था। एक निर्बल राष्ट्रवादी नेता ने साम्राज्य की छवि खराब करने के लिये भोजन का त्याग करके अपनी जान लेने की धमकी दे रहा था, जो इस बात का विश्वास दिलाती थी कि वह अपनी सभी कालोनियों में सेवा देने के द्वारा शासन कर रहा था। गांधी ने बड़ी बारीकी के साथ ब्रिटिशों की मेज को घुमा दिया; शाही नीतियों को उनकी मांग को पूरा करने के लिये झुकना पड़ा।

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