अटल, आदर्शवादी और एक साहसी योद्धा, महात्मा गांधी ने कठिन प्रतिज्ञा की और बिना हिचकिचाये उनका पालन किया था!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

ब्रिटिश राजशाही को परेशान करने के लिये सिर्फ एक आदमी लगा, एक विनयशील सज्जन पुरूष मोहनदास करमचंद गांधी, और इस आडम्बररहित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने बिना किसी नाराजगी और दबाव के यह कार्य कर दिया। उन्होंने सिर्फ, लागातार, विभिन्न प्रकार के शांतिपूर्ण विरोधों के द्वारा भारत को छोड़ देने का दबाव बनाया। उनकी बहन, रैलिएट, के द्वारा “पारे की तरह बेकरारी” बताया गया, महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सच्चे ‘बाप’ थे।

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लम्बे समय के लिये, मेरे दादाजी द्वारा हर साल महात्मा गांधी के जन्मदिन 30 जनवरी पर पोरबंदर की यात्रा करने के द्वारा सम्मान दिया जाता था। यह एक निश्चित परम्परा थी….उनकी मानवता की सेवा करने के तरीके को। उन्होंने विश्व के सभी कोनों से आने वाले लोगों के साथ बात करके वह दिन साबरमती आश्रम में बिताया, और जिन लोगों ने एक शताब्दी बाद जन्म लिया, एक पीढ़ी जो बहुत थोड़ा, कई बार तो अनसुलझा विचार राष्ट्रपिता के बारे में रखता है, उनके लाभ के लिये बापू के साथ अतीत को पुनर्जीवित कर दिया।

मेरे पिता ने बताया कि मेरे दादा महात्मा से सम्बंधित पोट्पाउर्री की घटना में शामिल थे…….विरला, गैर अभिलेखित किस्सा जिसने राष्ट्र के प्रति समर्पित जीवन में चमक को भर दिया।

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मैं इच्छा करता हूं कि मुझे ऐसे महापुरूष से मिलने का सौभाग्य मिले…….

हम सब उनके बनाये हुये प्रभाव को पढ़ते हुये बड़े हुये है, परिणामस्वरूप ब्रिटिश राज के उपनिवेश से छुटकारा दिलाने को नेतृत्व प्रदान किया। उन्होंने ‘दांडी यात्रा’, ‘स्वदेशी आंदोलन’, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और कई अन्य आंदोलनों के द्वारा साम्राज्यवादियों की अवज्ञा करके चुनौती दी।

ब्रिटिशों को भुलाकर, गांधी ने जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के विभाजनकारी और स्वयं की सेवा की राजनीति के सामने भी टिके रहे। हालांकि, उनकी भारत को ब्रिटिश राज के चंगुल से मुक्त कराने की अजेय इच्छा के आगे वे किसी भी स्थिति से समझौता करने के लिये तैयार थे। उनके लिये भारत को स्वतंत्र कराने के आगे कुछ भी नहीं आ सकता था।

लेकिन वह आदमी कौन था? ऐसा क्या था जिसने उसे सम्पूर्ण राजशाही के खिलाफ उकसाया?

वह एक राजनेता, शासक, जनरल या एक तानाशह नहीं था। वह एक रहस्य, या एक पथप्रदर्शक गुरू नहीं था। वह एक प्रयोगवादी, एक सत्य और सौहार्द्य को चाहने वाला था। लगातार सत्य की अपनी खोज में, उन्होंने धर्म, अध्यात्मिकता, नारी की स्थिति, स्वास्थ्य, शिक्षा, पहनावे आदि पर गहन चिंतन किया।

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उनके होने का अपना ही उद्देश्य था, और वह शुद्धता थी, नेहरू और जिन्ना की तरह नहीं, जिन्होंने राजनैतिक स्थिति की शरण लिया था। चालीस के दशक की शुरूआत में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद गांधी जी विरोध में उठ खड़े हुये थे जिसने ब्रिटिशों को कई मोर्चों पर खींचा था, नेहरू और जिन्ना ने राजनैतिक अवसरों को महसूस किया। भारत को आजादी मिलने के बाद इसने लाभांश भी अदा किया और नेहरू और जिन्ना को अपने देश के प्रथम प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला।

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गांधी गरीबों के लिये नि:स्वार्थ भाव से लड़ सकते थे क्योंकि वह उनके संघर्ष और दर्द के साथ उनको पहचान सकते थे……. और अब तक उनके शिष्यों में राजा, रजवाड़े, अस्पृश्य, धनी, गरीब, विदेशी और महिलायें थी।

वह एक विचित्र शख्सियत थे जिनके पास अपने जीवन भर में विविध प्रकार की राय थी। 1918 तक, ब्रिटिश राजशाही के एक प्रबल पक्षधर थे और 1919 में अमृतसर हत्याकांड के बाद पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत किया।

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कांग्रेस, अपने बनने के दिनों में, वकीलों और प्रबुद्ध वर्ग को शामिल करते हुये धनी सदस्यों का हुआ करता था। जिसका उद्देश्य उनके बीच के मुद्दों पर चर्चा करना और मिलना था, लेकिन सामान्य जनता के साथ कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं था। जब गांधीजी ने इस दृश्य में अपने आपको जोड़ा तो स्वतंत्रता समूह का आंदोलन बना। तीसरे दर्जे जैसे निचले डिब्बे में यात्रा करना, एक छड़ी के साथ धोती में लिपट रहना, उन्होंने  विनम्र रहन सहन और कठिन परिश्रम का प्रतीक दिया।

पाकिस्तान के बनने ने बड़े पैमाने पर, विशेषकर पंजाब और बंगाल में, धार्मिक हिंसा को उकसाया। हतोत्साहित गांधी ने हिसा प्रभावित क्षेत्र की यात्रा, आशा और धीरज दिलाने की उम्मीद से किया था। वह इस अंत:संघर्ष का अंत देखने के लिये बहुत इच्छुक थे जिसे उन्होंने कई बार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक असहिष्णुता का अंत करने के लिये आमरण अनश्न किया था।

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1948 की शुरुआत में, 78 वर्ष के वृद्ध गांधी ने अपना अंतिम उपवास रखा। पाकिस्तान को दिया जाने वाला नकद धन मुद्दा था। उनकी उदारता को कई भारतीयों द्वारा गलत समझा गया और गांधी ने भी इसे समायोजित किया। नाथूराम गोडसे, एक हिंदू राष्ट्रवादी, ने भी समान विचार को देखा। उसने 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या, बहुत नज़दीक से उनके सीने पर तीन गोलियां दाग कर, कि!

गांधी के अंतिम शब्द, ‘हे राम’, आज तक हमारे मस्तिष्क में घूमता रहता है।

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