पैरालिम्पिक (विकलांगों के ओलम्पिक) की विजेता दीपा मलिक ने सभी रूढियों को कैसा तोड़ा जिसे समाज ने महिलाओं को दूर रखने के लिये बनाया था

Posted on by Arnab
 
  

“मैं इस पदक का उपयोग भारत में विकलांगता के साथ महिलाओं के समर्थन के लिये करना चाहती हूं,” प्रफुल्लित दीपा मलिक ने मीडिया से रिओ ओलम्पिक में इतिहास लिखने के बाद कहा। मलिक, जिन्होंने रजत पदक महिलाओं के शॉटपुट एफ53 खेल में जीता था, पहली महिला है जिन्होंने भारत के लिये पैरालिम्पिक खेल में पदक को जीता है।

मलिक की कहानी प्रेरणादायक है, क्योंकि यह उन सभी रूढ़ियों को तोड़ने के लिये है जिसे समाज ने महिलाओं के ऊपर बोझ के रूप में डाला है। वह 45 वर्षीय विवाहित महिला हैं, दो बच्चों की मां, और सबसे महत्वपूर्ण, एक निम्नांगों के पक्षाघात से ग्रसित हैं- एक ऐसा मनुष्य जिसके कमर से नीचे का भाग पक्षाघात से पीड़ित हो।

Deepa Malik

दीपा मलिक ने सभी विषम परिस्थितियों और रूढ़िवादी चिन्हों को नकार दिया है

एक समाज में, यह सभी कारक एक महिला के लिये विपदा हो सकते है। एक अधेड़ महिला, पहियेदार कुर्सी से बंधी, हमारे समाज में दया का विषय हो सकती है, चाटुकारिता का नही। उस महिला को हरियाणा से अभिवादन मिल रहा है- एक ऐसा राज्य जहाँ लिंगानुपात तीर्यक है और एक भद्दे ढ़ंग का पितृसत्तामक होने के लिये भी मशहूर है- सभी को चौका दे रहा है।

लेकिन मलिक ने उन सभी उपनामों को नकार दिया जिसे एक महिला के ऊपर उनकी मातृभूमि के तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अर्पण किया जाता है। वह पहिये वाली कुर्सी पर 1999 से बंधी हुयी है, ठीक उसी साल जब भारत ने कारगिल युद्ध को जीता था। सेना में अपने पति के साथ, मलिक युद्ध नायकों की प्रत्यक्ष अपने  सटे हुये मकान से बनी थीं। सेना के अस्पताल जिसमें उन्हें भर्ती किया गया था, ऐसे सैनिकों से भरा था जिन्होंने अपने एक या दो अंगों को युद्ध में खो दिया था।

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राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी पैरालिम्पिक की विजेता दीपा मलिक को पुरस्कार देते हुये

लड़ाकों के पलटाव को देखकर, मलिक ने अपना साहस प्राप्त किया था। उन्होंने एक अपाहिज़ की तरह जीने से मना कर दिया, यद्यपि रीढ़ के ट्यूमर ने उनके कमर से नीचे के भाग लकवाग्रस्त कर दिया था। छ: साल पहिये वाली कुर्सी पर बिताने के बाद विकलांगों के खेल की तरफ उन्होंने ध्यान दिया। मलिक ने जलोपचार के रूप में तैराकी को 36 साल की अवस्था में चुना था। 2009 के अंत तक, वह खेलकूद की ओर उन्मुख हुयीं। 39 वर्ष की अवस्था में, मलिक ने भाला फेंक और शॉट-पुट में हिस्सा लिया था। उनके इस प्रयास ने उन्हें एक पहचान दिया; उन्हें अर्जुन पुरस्कार 2012 में दिया गया था।

मलिक ने अपने आपको सीमित करने के बजाय स्वयं में विश्वास किया, वास्तविकता तो यह है कि पहियेदार कुर्सी ने उन्हें मुक्त कर दिया। अपने लकवा ग्रस्त होने के बाद, इस महिला ने तैराकी को रफ्तार दिया, हिमालय पर चढ़ाई किया, घुड़सवारी किया और अपने नाम चार विश्व रिकॉर्ड को भी अपने नाम कर लिया। उनका पैरालिम्पिक खेल जीतना सिर्फ उनके कभी न हार मानने के जज़्बे को दोहराता है।

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भारतीय पैरालिम्पिक और ओलम्पिक पदकों की तालिका में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है

ओलम्पिक और पैरालिम्पिक प्रदर्शन के बीच का अंतर धीरे-धीरे धुंधला होता जा रहा है। यह भारत का पैरालिम्पिक खेलों में अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन रहा है, रिओ ओलम्पिक में जीते गये पदकों से बेहतर है जिसमें हमने केवल दो पदकों को जीता है। भारत के 117 खिलाड़ियों में से रिओ ओलम्पिक में प्रतिभाग करके मात्र एक रजत और एक कांस्य पदक के साथ वापस आये। जबकि 19 पैरालिम्पिक खिलाड़ियों में से चार- दो स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक के साथ वापस आये।

“वे कहते हैं महिलाओं को हरियाणा में खेलों में प्रतिभाग करने के लिये प्रोत्साहित नहीं किया जाता है। लेकिन जब मैं रिओ से वापस आयी, 200 लोग मेरे गांव से आये, पूरी खाप मुझे लेने आयी थी। उन्होंने मुझे गांव का मान बढ़ाने के लिये गदा भी भेंट किया था” । मलिक ने रिओ से अपने वापस लौटने पर मीडिया से बात करते समय कहा।

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दीपा मलिक का अपराजित मनोभाव लाखों भारतीय महिलाओं को प्रोत्साहित करता है

मलिक अपने मनोभाव से हमें प्रोत्साहित करती हैं। वह अपाहिज के रूप में वर्गीकृत नही होना चाहती, और अपने पैर को कमजोर के रूप में कहना ज्यादा पसंद करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे बिना चश्मा पहना व्यक्ति अपनी आंखों को कमजोर कहता है।

दीपा मलिकआपने हमें गौरवांवित महसूस कराया है।

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