जेनाबाई दारूवाली, अपराधजगत की महामाता जिन्होंने दाउद इब्राहीम, करीम लाला और हाजी मस्तान के बीच शांति स्थापित करने के लिये बातचीत कराया

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1920 की शुरुआत में एक मुस्लिम परिवार में जन्मीं, ज़ैनब मुम्बई के डोंगरी क्षेत्र में पली बढ़ीं थी। ज़ैनब का, अपनी जवानी के दिनों में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से निर्दयी महिला डॉन जेनाबाई बनने की कहानी बहुत मजेदार है।

इस ख्याति प्राप्त के पास वह सबकुछ है जिसके कारण जेनाबाई दर्वेश को परमपूज्यनीय माना गया, साथ ही जिन्होंने मुम्बई में लड़ने के लिये तत्पर अपराधजगत के मुखियाओं में कुछ दिनों के लिये समझौता करा दिया था। सत्तर के दशक में, अपने दुस्साहस के लिये जानी जाने वाली यह महिला एक बहुत बड़ा नाम थी, जो पुरूष सत्तात्मक अपराधजगत में चर्चित था। उसने अपराध जगत में चर्चित मुखियाओं हाजी मस्तान और करीम लाला के साथ संघर्ष किया था।

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ज़ैनब ने, जबतक वह जेनाबाई नहीं बनी थी, भारत के स्वतंत्रता आनदोलन में हिस्सा लिया था। वह 14 साल की थी, जब उनकी शादी हुयी थी, लेकिन यह भी उन्हें धरनों में हिस्सा लेने से रोक नहीं पाया। उनका पति उन्हें प्राय: इस बात के लिये मारता था क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वह हमेशा साम्प्रदायिक दंगों में हिंदुओं की रक्षा करती थी। जेनाबाई का अपराधजगत में पदार्पण 50 के दशक में उस समय होता है जब उनका पति विभाजन के बाद पाकिस्तान चला गया, उसे अपने पांच बच्चों के भरण पोषण के लिये अकेला छोड़ दिया था। इस अवधि के दौरान, जेनाबाई ने राशन के अनाजों की स्मगलिंग शुरू कर दिया था जिसे भारत सरकार द्वारा अनाजों की कमी को समाप्त करने के लिये शुरू किया गया था। इस कमी ने मुस्लिमों को स्मगलिंग के अनाजों को खरीदने के लिये दबाव बनाया था।

जल्द ही, उसे जेनाबाई चावलवाली का नाम मिला। इसके बाद वह एक तमिल डॉन मुनीस्वामी मुदालियर से 60 के दशक में मिली, और शराब के व्यवसाय में घुस गयी, शराब की तस्करी से उसे लाखों में लाभ प्राप्त हुआ। अब वह जेनाबाई दारूवाली बन गयी थी। मुदालियर ने जेनाबाई की मुलाकात हाजी मस्तान से करायी, जो मुम्बई के अपराध जगत के व्यवसाय पर शासन कर रहा था।

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जेनाबाई की लोकप्रियता बढ़ने लगी और उसे इन पुरूषों के बीच मजबूत आधार मिलने लगा था। लोग उसके पास जाने लगे जिससे कि उनके बीच के अपने आंतरिक झगड़ों को सुलझाया जा सके। जल्द ही, वह महामाता के रूप में उभर कर सामने आयी, और जो कोई भी सहायता और सुझाव के लिये आया उसे प्रदान किया।

1962 में, जब जेनाबाई का शराब व्यवसाय ठप्प हो गया था, तब वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यशवन्त राव चह्वाण से मिली, और पुलिस का खुफिया बनना स्वीकार कर लिया। मुखबिरों को उन दिनों स्मगलिंग किये हुये सामानों को पकड़वाने पर पकड़े गये सामान का 10% दिया जाता था। लेकिन जेनाबाई ने अपने अनाज और शराब तस्करी के व्यवसाय को जारी रखा था।

जेनाबाई को जिस काम से सबसे अधिक प्रसिद्ध मिली थी वह एक ख्याति प्राप्त समझौता पर बातचीत कराने के लिये था, जिसमें उन्होंने कट्टर शत्रुओं- इब्राहिम भाइयों (दाउद और साबिर) और करीम लाला के नेतृत्व में पठान गैंगस्टर को- और हाजी मस्तान के साथ हाथ मिलाकर एक सेना को बनाया था।

भगवान, एक पुलिस इंस्पेक्टर, सबसे पहले जेनाबाई से उस समय मिला था, जब वह एक चर्चित महामाता थी, उस महिला डॉन को वह झग़ड़ालू के रूप में याद कर करता है जिसने गैंगस्टर और पुलिस दोनों को अच्छी तरह से संतुलित किया था। उसने जोड़ते हुये कहा, “ वह लगभग मस्तान और लाला के उम्र के बराबर थी इसलिये दोनों ही उसका सम्मान करते थे। दाउद उसे मौसी बुलाता था….वह पुलिस थाने में स्थानीय खबरों के बारे में सूचना को पहुंचा कर संतुष्ट करती थी। उसने सभी को सुनिश्चित कर रखा था कि वह सभी की निगाह में एक अच्छी औरत थी।

जेनाबाई, के बारे में कहा जाता है कि उसने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजीदेसाई के हाथ में राखी बांधी थी और भूतपूर्व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के द्वारा सम्मान भी प्राप्त किया था।

1993 में बाबरी मस्जिद को गिराये जाने के बाद हुये हिंदू मुस्लिम दंगे के साथ ही जेनाबाई अपने अस्तित्व को खोने लगी थी। उम्र के साथ, उन्होंने अपने व्यवसाय को भी धीमा कर दिया था।

जेनाबाई की पुत्री खादिजा, जो अब 70 की उम्र को पार कर चुकी है अपने आपको सामाजिक कार्यकर्ता बुलाया जाना पसंद करती है। जेनाबाई 80 के दशक के अंत तक अच्छी तरह से जिंदा रहीं। जब उनकी मृत्यु हुयी, तब यह अदम्य इच्छा शक्ति वाली महिला अपने परिवार और चाहने वालों से घिरी हुयी थीं।

टीवी धारावाहिक एक मां जो लाखों के लिये बनी अम्मा जो अभी कुछ ही दिनों पहले ज़ी टीवी पर शुरू हुआ है, जेनाबाई के जीवन पर आधारित है।

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