एम्बुलेंस को आगे जाने का पहला अधिकार है, लेकिन दिल्ली में, जनता की संवेदनहीनता उनको अस्पताल जाने के रास्ते में ही मार देती है!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

पिछले हफ्ते ही एक मित्र ने अपने भाई को खो दिया क्यों कि एम्बुलेंस सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी थी। कल्पना करें कि मीलों लम्बे गाड़ियों के जाम के बीच में एक भयंकर बीमार आदमी के साथ आप असहाय फंसे हुये। यह खत्म होने के महसूस कराता है।

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दिवंगत लड़का हृदय रोग से पीड़ित था। दानकर्ता दान देने के लिये तैयार था और दानप्राप्तकर्ता दान लेने के लिये तैयार था, लेकिन हृदय लेने में बहुत समय लग गया। आपातकाल के सायरन की आवाज रास्ता साफ करने के लिये चिल्ला रही थी लेकिन कोई भी रास्ता देकर सहायता करने में पर्याप्त संवेदनशील नहीं था। एम्बुलेंस को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में एक घंटे का अतिरिक्त समय लग गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी!

यह क्या था…..जनता की संवेदनहीनता? असंवेदनशील यातायात पुलिस ने, साइरन की आवाज सुनने के बजाय, एम्बुलेंस को आगे जाने के  अधिकार के लिये कुछ भी नहीं किया।

अंगों की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच एक बहुत बड़ा अंतर पहले से ही है। एक अनुमान के अनुसार एक साल में 175,000 किडनी, 100,000 यकृत और 20,000 फेफड़ों की आवश्यकता है, अगर हमें दानकर्ता मिल भी जाते हैं तो परिवहन इस मौके को खत्म कर देता है।

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अगर सरकार और नागरिक समाज अबाध चिकित्सकीय  सहायता के लिये मुक्त परिवहन  सुनिश्चित करने के लिये अपनी सामूहिक जिम्मेदारी को उठायेगा, तो कोई भी व्यक्ति समयाभाव की कमी के कारण चिकित्सकीय सहायता के बिना नहीं मरेगा।

कुछ दिनों पहले, मैं खुशी से आश्चर्यचकित था कि हरियाणा और दिल्ली पुलिस के सन्युक्त प्रयासों से एक गम्भीर मरीज़ को बिना किसी देरी के ‘हृदय’ का परिवहन किया गया था। यह सुविधा गुड़गांव में फोर्टिस अस्पताल से ओखला में महज 30 मिनट में पहुंचायी गयी।

अधिकारियों की सहायता के बिना, इसे करने में डेढ़ घंटे लग गये, यह अंतर बहुत अधिक होता है! इसके लिये एक ग्रीन कॉरीडोर बनाया गया था और एम्बुलेंस को इसी खाली पंक्ति में बिना कई बार गेयर को बदले लगातार चलते जाना था।

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वह समय पर पहुंच गया था और आज किसी का दिल धड़क रहा है क्योंकि वह समय पर पहुंच गया था।

यात्रा के विशेष मार्ग में जगह जगह पर सीसीटीवी कैमरा लगाया गया था जिससे उन गाड़ियों को पहचाना जा सके जो निर्देशों के बावजूद एम्बुलेंस को जाने के लिये रास्ता नहीं दे रहे थे। हमारे पास संसाधन है, मानवशक्ति है और लक्ष्य को पाने के तरीके भी हैं। अगर हमें कुछ चाहिये तो वो इच्छाशक्ति है।

भारत में अंग प्रत्यर्पण 0.34 प्रति दस लाख की जनसंख्या तक बढ़ चुकी है। हलांकि, यह सफलता निरर्थक हो जायेगी अगर हृदय को सही समय पर पहुंचाने में असफल हो जाते हैं। संवेदनशीलता की सख्त आवश्यकता है। यह समझ से परे है, विश्वास से भी बाहर, कि लोग एम्बुलेंस की आवाज सुनकर भी जाने के लिये रास्ता नहीं देते हैं।

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हमें योजनाओं पर ज्यादा समय और संसाधन के साथ साथ संयोजन पर खर्च करना चाहिये। हवाई एम्बुलेंस एकमात्र सुनिश्चित तरीका है जिससे यातायात के कारण कोई देरी नहीं होगी। यह उपयोग में भी लाया जायेगा, लेकिन केवल उन्हीं लोगों द्वारा जो इस सेवा को लेने में वित्तीय रूप से समर्थ होंगे।

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