एम्स बड़े पैमाने पर अमीरों और शक्तिशालियों पर ध्यान देता है………अपनी बारी के आने के इंतज़ार में गरीब को सड़कों पर सोने के लिये छोड़ दिया जाता है!

Posted on by Anand Mukherjee
 
  

अगर एक परिवार को विश्वसनीय चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, तो मैं उसे निजी अस्पताल में लेकर जाऊंगा, जैसे फोर्टिस और मैक्स हेल्थ्केयर। मैं उसे सरकारी अस्पताल में नहीं ले जाऊंगा, और मैं इस बारे में घमंड नहीं करूंगा। सरकारी अस्पतालों को भारत की चिकित्सा परिधि में बढ़ते विश्वास का चेहरा होना चाहिये। इसे अधारिक ढ़ाचे और उस क्षेत्र के उत्कृष्ट चिकित्सक के साथ सुसज्जित होना चाहिये। इसे उच्च स्तर के स्वास्थ्य और सफाई को दिखाना चाहिये। इसे लोगों के प्रति भी संवेदनशील बनाना चाहिये जो चिकित्सा सेवा का ध्यान नहीं देते है, इसके लिये एम्स बहुत प्रसिद्ध है।

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वास्तव में, देश में केवल एम्स ऐसा सरकारी अस्पताल है जो आधुनिक चिकित्सा सुविधा और चिकित्सा मस्तिष्कों से युक्त है, लेकिन दुख की बात है, कि वे केवल प्रसिद्धि प्राप्त और अमीरों का उपचार करते हैं, कम से कम वे प्राथमिकता तो देते हैं। एक गरीब आदमी के लिए अपने बीमार बच्चे के साथ, अत्यंत आवश्यक उपचार को चाहने वाले के लिये एम्स में बहुत कम उम्मीद है। महत्वपूर्ण क्षणों को खोते हुये, वह अस्पताल के प्रशासनिक तंत्र में फस जायेगा। फिर भी कोई दावा नहीं कर सकता कि वह चिकित्सक से वास्तविकता में मिल पायेगा।

इस परिस्थिति में, निजी अस्पताल जैसे अपोलो, मैक्स हेल्थकेयर और फोर्टिस के ऊपर सरकारी अस्पतालों से अधिक धन लेने के लिये आरोप कैसे लगाया जा सकता है। कम से कम, एक मरीज़ को सड़क पर सोने के लिये, अपनी बारी का इंतज़ार करने के लिये तो नहीं छोड़ा जाता है। उस पर तुरंत ध्यान दिया जाता है जैसे किसी अमीर पर दिया जाता है।

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सरकारी अस्पताल के कर्मचारियों का नाम तो कागज़ पर होता है लेकिन वास्तविकता में वे अनुपस्थित रहते हैं। कुछ बिना आये ही नियमित अपना वेतन लेते रहते हैं। मुझे याद है, मोटरबाइक चलाते समय मेरे चाचा के पैर में एक बार चोट लगी थी और हमारे पास एम्स ले जाने के वाला कोई और रास्ता नहीं था और वह पास में भी था। हमारे वहाँ पहुंचने के बाद, हमारे कुछ घंटे तो सही आदमी तक पहुंचने मे लग गये। तंत्र बहुत ही जटिल और गुप्त उपायों से भरा है जिससे बीमार आदमी के बचने की बहुत कम उम्मीद रहती है। हमने प्रार्थना कि, मरीज़ को देखने के लिये चिकित्सक से भीख मांगी और हम भाग्यशाली थे कि उसका दिल पिघला और उसने देख लिया। मेरे कुछ मित्र है जिन्होंने मुझे डरावनी कहानियां सुनाई है कि किस तरह चिकित्सक गरीबों का उपचार करते हैं। उनकी सेवायें सम्पन्न लोगों के लिये सुरक्षित होती हैं। उनकी अत्यंत मोटी चमड़ी ने फिर एक रूप बदला जब मुझे एक और चारपाई देने से मना कर दिया गया, जैसा कि मैं अपने मरीज़ के साथ वहाँ रूकने जा रहा था। अंत में मुझे फर्श पर एक चादर बिछा कर सोना पड़ा।

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भोजनालय की अस्वास्थ्यकारी परिस्थितियों ने मेरी भूख खत्म कर दी। मैं बाहर खाने चला गया।

एम्स को विश्वस्तरीय चिकित्सकों से सम्पन्न किया गया है, लेकिन यह सामान्य लोगों की अयोग्यता है कि वे इस तरह की सुविधा से वंचित हैं, जो उन्हें निज़ी अस्पतालों के निजी चिकित्सकों के पास जाने के लिये मजबूर करता है। ये बहुत महंगे हैं लेकिन ज्यादा मह्त्वपूर्ण है। यद्यपि कई सारे सरकारी अस्पताल हैं जो क्षेत्र के आम आदमियों की जनसंख्या के आधार पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिये हैं, उनकी दी जाने वाली सेवायें गुणवत्ता और मात्रा के संदर्भ में उपलब्ध कराने में अपर्याप्त है।

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निजी अस्पतालों द्वारा सामान्य भारतीयों का शोषण करने के विशेष लाभ की अनुमति मामले को सरकार द्वारा पुनर्विचार करना चाहिये। राजकीय अस्पतालों को आधारिक ढ़ांचे, पेशेवर  प्रबंधन, समर्पित कर्मचारी और कर्मचारियों के परिष्कृत तरीके की सख्त आवश्यकता है। हमें स्वच्छता के स्तर और आधारिक ढ़ाचे, जैसे बिस्तरों की संख्या में सुधार लाना चाहिये, हमें इन्हें समर्पित योग्य चिकित्सकों की देखभाल में देना चाहिये, जो मरीजों का अच्छे से देखभाल करते है। दवाइयां अपर्याप्त हैं, कर्मचारियों का वेतन कम और कार्य दबाव अधिक है। आधारिक सुविधायें जैसे शौचालय को बनाये रखने की आवश्यकता है।

यदि यह नहीं होता है, तो निजी अस्पताल पीड़ित भारतीयों से करोड़ों रूपये का लाभ लेते रहेंगे। इसलिये यह नैतिकता के साथ ध्यान देने वाला प्रश्न है।

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